संस्मरण - (एक द्रवित पिता की पाती)-------

अभी कुछ समय पहले देश के सुप्रसिद्ध उद्योगपति अनिल अग्रवाल वेदांता वाले का एक बेहद ही मार्मिक पोस्ट इंस्टाग्राम पर वायरल हुआ - "मेरे जीवन का सबसे दुखद दिन"। पोस्ट पढ़कर मुझे बहुत दुख हुआ और हृदय दुख से भर गया कि एक पिता के लिए उसकी संतान का दुनिया छोड़ के जाना वास्तव में सबसे बड़ी हृदय विदारक घटना है। जिसे कोई भी नहीं समझ सकता। सिवाय उनके जिन्होंने वह दुख स्वयं महसूस किया हो।

यह सब लिखने का मेरा उद्देश्य जीवन के गहरे दुख में एक पुराने संस्मरण की गहराई में उतर जाना है। जो मैं अपने बाबूजी स्वर्गीय श्री पुरुषोत्तम दास रतेरिया के जीवन संस्मरण को आपके साथ साझा करना चाहती हूँ कि - इस वर्ष बाबूजी की 100 वीं जन्मतिथि पर मैंने उनकी कुछ पुरानी डायरी पढ़ी उसमें एक छोटे से कोने पर बाबूजी ने एक पिता की वेदना को अत्यंत ही मार्मिकता से अभिव्यक्त कर अपनी भावनाओं को उड़ेल दिए हैं कि - - उनकी नौ वर्ष की प्यारी बेटी थी जिसका नाम उन्होंने राधा रखा था और वे असमय ही काल के गाल में समा गई... ।

जीवन के गहरे विषाद के क्षण में अपने बच्चे के लिए एक पिता क्या महसूस कर सकता है उनके शब्द, उनके भाव, उन्हें मैं अक्षरशः अभिव्यक्त कर रही हूँ क्योंकि ये दुख भरे क्षण में पिता की भावना को समझाना मेरे लिए अपने शब्दों में व्यक्त करना असंभव है।

संस्मरण 1955- - संतान के प्रति माँ - बाप का अनुराग कितना तीव्र होता है। यह या तो तब पता चलता है कि जब किसी मनुष्य की संतान हो ही नहीं या फिर तब कि जब उसकी संतान सदा के लिए इस संसार को छोड़ के जाती है। तब पता चलता है कि मनुष्य किस प्रकार अपना प्राण देकर भी अपनी खोई हुई संतान को पा लेना चाहता है। और उसे जीता जागता एवं सुखी देखना चाहता है। जब तक बच्चे छोटे रहते हैं। तब तक माँ बाप का अनुराग अधिक निःस्वार्थ पवित्र और प्रचंड हुआ करता है। वे अपने बच्चों की भोली सूरत देख देखकर उन पर बली - बली जाते हैं। और उनकी एक - एक मुस्कान के लिए स्वयं हजारों कष्ट सहने को तैयार रहते हैं। लेकिन इस संसार में एक चीज ऐसी भी है जिसे जीत सकना मनुष्य मात्र की ताकत के बाहर की बात है वह है मौत..। नाम ही कितना भयानक कितना डरावना सा है उसके सामने मनुष्य बिल्कुल नरभक्ष हो जाता है, विवेक खो बैठता है। १९. ६.१९५५ को उसकी मासूम बच्ची इस स्वार्थी दुनिया को सदा के लिए त्याग कर चली गई ९ वर्ष की उम्र में ही भगवान को प्रिय हो गई होती भी कैसे नहीं चीज ही ऐसी थी कितनी सुंदर थी वह गोरा रंग बड़ी - बड़ी आँखें और रेशम जैसे बारीक लम्बे बाल कितनी सुशील और कितनी सभ्य अपनी बच्ची की सभ्यता देख देखकर बाप गर्वित हो उठता था।                               पुरुषोत्तम दास रतेरिया

बाबूजी की मार्मिक पाती को पढ़कर मेरे नयन भीग गए और विषाद की गहरी साँसों के साथ अंर्तमन से यह आवाज निकली कि वास्तव में जीवन के दुख और पीड़ा को वहीं जानते हैं। जिन पर इनकी साया रहती है..।

SK
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