(डॉ. विजय प्रकाश शर्मा के काव्य-संग्रह संवेदना की पुस्तक समीक्षा)
डॉ. विजय प्रकाश शर्मा का काव्य-संग्रह ‘संवेदना’ उपनिषदों के ‘पंचकोश’ सिद्धांत की दृष्टि से देखा जाए तो तैत्तिरीय उपनिषद के “अन्नमय कोश” अर्थात भौतिक ज्ञान तथा “मनोमय कोश” अर्थात भावनात्मक चेतना—दोनों का सुंदर समन्वय प्रस्तुत करता है। एक ओर डॉ. शर्मा मानव वैज्ञानिक के रूप में अपने गहन बौद्धिक व्यक्तित्व से परिचित कराते हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी कविताओं के माध्यम से वे भावनात्मक संवेदनशीलता की गंभीर उपस्थिति दर्ज कराते हैं। इस प्रकार उनका व्यक्तित्व मनसा, वाचा और कर्मणा से परिपूर्ण दिखाई देता है।


संग्रह के आरंभिक मुक्तकों को यदि स्वादिष्ट साहित्यिक ‘स्टार्टर’ कहा जाए, तो शेष कविताएँ वास्तव में भावनाओं के समृद्ध ‘मेनकोर्स’ के समान हैं। संवेदना, प्रतीक्षा, प्रेम-ग्रन्थि, विभ्रम, अलख और भ्रम-गन्ध जैसी रचनाएँ प्रेम की सूक्ष्म अनुभूतियों, विरह, प्रतीक्षा और भावनात्मक गहनता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त करती हैं। इन कविताओं में प्रेम की पावस फुहार तन-मन को आच्छादित करती प्रतीत होती है।
विशेष रूप से “बादलों के पार” कविता भारतीय ग्राम्य जीवन से दूर आजीविका की तलाश में भटकते श्रमिकों की वेदना को अत्यंत मार्मिक रूप में प्रस्तुत करती है। कुछ ही पंक्तियों में कवि ने विस्थापन, गाँव की स्मृतियों और मातृभूमि के आकर्षण का ऐसा चित्र खींचा है जो पाठक के अंतर्मन को स्पर्श करता है। इसी प्रकार शिक्षण संस्थान, ईमानदारी तथा आह्वान जैसी कविताओं में सामाजिक व्यवस्था, शैक्षिक विसंगतियों और नैतिक पतन पर तीखा किंतु संयत प्रहार दिखाई देता है। कवि का आक्रोश यहाँ “थोड़ा लिखा, अधिक समझना” की शैली में प्रभावोत्पादक बन जाता है।
संवेदना केवल एक कविता का शीर्षक नहीं, बल्कि पूरे संग्रह की आत्मा है। कवि ने विविध रचनाओं के माध्यम से यह स्थापित करने का प्रयास किया है कि संवेदनशीलता प्रत्येक मनुष्य के भीतर विद्यमान वह अनिवार्य तत्व है, जो उसे दूसरे के सुख-दुःख से जोड़ता है। अध्यापन से लंबे समय तक जुड़े रहने के कारण कवि की रचनाओं में सहज रूप से मार्गदर्शन, सामाजिक चेतना और मानवीय मूल्यों का संदेश परिलक्षित होता है।
समग्रतः ‘संवेदना’ एक ऐसी कृति है जिसे “गागर में सागर” कहना समीचीन होगा। इसमें प्रेम, सामाजिक चेतना, मानवीय करुणा, संघर्ष, व्यवस्था-विरोध और अतीत के प्रति मोह—सभी भावनाएँ समाहित हैं। कवि की रचनाओं में नॉस्टेल्जिया की हल्की छाया भी है, जो उन्हें और अधिक आत्मीय बनाती है। यह संग्रह प्रत्येक आयु-वर्ग के पाठकों में संवेदनाओं को जागृत करने की क्षमता रखता है तथा समकालीन हिंदी काव्य-जगत में अपनी सार्थक उपस्थिति दर्ज कराता है। यह कविता संग्रह फ्लिपकार्ट में उपलब्ध है ।
डॉ.दयानन्द अवस्थी
(पुस्तक समीक्षक )









