डॉ.मीनकेतन प्रधान का सफल आयोजन
रायगढ़ - - विश्व हिंदी अधिष्ठान ( न्यास) रायगढ़, छत्तीसगढ़, भारत तथा देवम् फाउंडेशन कला एवं संस्कृति संस्थान बुल्गारिया (यूरोप) के संयुक्त तत्त्वाधान में भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर केंद्रित अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं काव्य पाठ का आयोजन विगत 29 मई को संपन्न हुआ, कार्यक्रम का शुभारंभ मां शारदे की स्तुति आदरणीया वंदना कुंवर रायजादा द्वारा की गयी । तत्पश्चात डॉ मीनकेतन प्रधान के उत्कृष्ट मंच संचालन से सम्मानीय अतिथियों का शुभ परिचय सहित स्वागत हुआ, मुख्य अतिथि द्वय प्रो. विनय चौहान कुलपति , शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय रायगढ़ एवं डॉ. विनय कुमार पाठक थावे विद्यापीठ गोपालगंज ( बिहार)के कुलपति एवं छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के पूर्व अध्यक्ष थे। मुख्य वक्ता के रूप में खंडवा मध्यप्रदेश से हिंदी के प्रख्यात ललित निबंधकार डॉ. श्रीराम परिहार जी का रायगढ़ आगमन हुआ था। वक्ता डॉ रमेश चंद्र श्रीवास्तव एवं डॉ.वीणा विज उदित ( अमेरिका ) का विशेष वक्तव्य हुआ। आरंभ में सम्मानीय अतिथियों का कैशलेस अंग वस्त्र एवं पुष्प गुच्छ से स्वागत विश्व हिंदी हिंदी अधिष्ठान की न्यासी डॉ. विद्या प्रधान ,डॉ. बेठियार सिंह साहू एवं पंकज रथ शर्मा द्वारा किया गया ।

विश्व हिंदी अधिष्ठान के द्वारा छायावाद के प्रवर्तक कवि मुकुटधर पांडे साहित्य सम्मान से सम्मान पत्र भेट करने के उपरांत अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं काव्य पाठ के इस आयोजन का उत्कृष्ट मंच संचालन श्रद्धेय गुरुदेव डॉ मीनकेतन प्रधान सर जी द्वारा किया गया । सर के द्वारा मंच संचालन इतना प्रभावपूर्ण था कि मैं आश्चर्यचकित रह गयी यह देखकर की निरंतर सभी सम्मानीय सदस्यों के विषय में निरंतर बोलते जाना उनके मुख से स्वत ही इतने सारे शब्दों का निरंतर निकलना मुझे तो एक ही बात का अनुभव हो रहा था *जिस प्रकार संत कबीर दास जी के विषय में हजारी प्रसाद द्विवेदी जी ने कहा कि कबीर दास जी भाषा के डिक्टेटर हैं, उसी प्रकार सर का निरंतर शब्द विन्यास किसी जादू की तरह था। यह उनके व्यक्तित्व की महान विशेषता है । सुंदर और सटीक शब्दों के प्रयोग में उनकी कोई शानी नहीं।
प्रधान सर जी की चेतना में जैसे सुंदर शब्दों का ज्वार भाटा समाया रहता है , ऐसा प्रतीत होता है । वे जब भी किसी मंच प खड़े होते हैं तो सारा माहौल उनके अनुकूल हो जाता है। वाणी खुद बख़ुद फूटने लगती है ।
बिना कुछ देखे बिना कुछ कागज हाथ में लिए वे इतने घंटे तक कार्यक्रम अकेले संचालन कर लेते हैं, यह अचरज की बात है ।
कार्यक्रम दो सत्रों में विभक्त था प्रथम सत्र में भारतीय ज्ञान परंपरा पर संगोष्ठी तथा दूसरे सत्र में काव्य पाठ किया गया, कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए गुरुदेव प्रधान सर जी ने प्रथम सत्र में माननीय कुलपति डॉ.विनय चौहान सर जी को मुख्य आतिथ्य के उद्बोधन हेतु आमंत्रित किया गया । आदरणीय चौहान सर जी ने उत्कृष्ट आयोजन हेतु विश्व हिंदी अधिष्ठान के संस्थापक डॉ मीनकेतन प्रधान सर को हार्दिक बधाई देते हुए कार्यक्रम की सराहना की एवं भारतीय संस्कृति को विश्व स्तर पर पहुंचाने में यह आयोजन सार्थक हो, ऐसी शुभकामनाएं दी। राष्ट्रीय चेतना का गान है वंदे मातरम इस पंक्ति से सभी श्रोताओं एवं वक्ताओं के हृदय में जैसे देशभक्त की लहर दौड़ पड़ी और सभी का मन देश भक्ति के भाव से अह्लादित हो गया, भारतीय ज्ञान परंपरा के विषय में कुलपति जी ने नारी सम्मान के संबंध में कहा कि हर एक ग्रहणी की रसोई से ही भारतीय ज्ञान परंपरा शुरूआत होती है,
इस कार्यक्रम की शुरुआत ही वंदे मातरम् एवं नारी के सम्मान से हो तो वो आयोजन का स्तर और कितना आगे जाने वाला है इसका भान आदरणीय विनय चौहान सर जी के वक्तव्य से ही हो गया था । उनके अपने मौलिक विचार के अनुरूप भारतीय शोध बोध नाम से एक पत्रिका के प्रकाशन की उद्घोषणा की । उन्होंने भारतीय ज्ञान का परिचय दिया॥
इस अवसर पर देवम फाउंडेशन बुल्गारिया की अध्यक्षा आदरणीया डॉ.मौना कौशिक मैडम (बुल्गारिया) ने भारतीय ज्ञान परंपरा विषय पर अपने उच्च विचार प्रस्तुत करते हुए स्वागत वक्तव्य दिया ।उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा को हमारे अतीत की धरोहर रे साथ ही वर्तमान और भविष्य की दिशा प्रदान करने वाली जीवंत चेतन बताया । तदन्तर प्रमुख वक्ता वेणु गूंजे गगन गाजे ललित निबंध पुस्तक के रचयिता डॉ. श्रीराम परिहार सर जी ने भारतीय ज्ञान परंपरा का विशद विवेचन करते हुए उसके वैदिक कालीन स्वरूप से ले कर अत्याधुनिक परिवर्तनशील वैज्ञानिक दौर में मनुष्य जीवन के लिए ज्ञान परंपरा की ग्राह्यता पर प्रकाश डाला ।
ऑनलाइन और ऑफलाइन जुड़े रचनाकारों में शोध की दृष्टि से उनके व्याख्यान को अत्यंत उपयोगी बताया ।
डॉ. परिहार ने भारतीय ऋषि - महर्षियों के दार्शनिक चिंतन को विश्व पटल पर ज्ञान का अकूत भंडार निरूपित किया । सभ्यता - संस्कृति की सतत गतिशीलता में मानव जीवन का विकास होता रहा है । उसी के साथ हमारी परंपराएं भी साथ चलती रहीं हैं ।
इसकी संपूर्ण विशेषताओं का उल्लेख उन्होंने कई महत्वपूर्ण पुस्तकों को संदर्भित करते हुए किया जिसमें धर्म, सभ्यता, इतिहास, खगोल, भूगोल, वैज्ञानिक चिंतन सहित अन्य भी अनेक महत्वपूर्ण बिंदु समाहित थे।अगले क्रम में संगोष्ठी के विषय -शीर्षक की प्रासंगिकता को उद्घाटित करते हुए मंच संचालक में डॉ. विनय कुमार पाठक को भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यावहारिक जीवन पर प्रभाव विषयक विश्लेषण के लिए आह्वान किया जिस पर डॉ. पाठक ने अत्यंत सहज सरल रूप में
ज्ञान के पारंपरिक ज्ञान के संग्रहण और संवर्धन को आज के भौतिकवादी युग में आवश्यक बताया। उन्होंने गौतम बुद्ध के एक संक्षिप्त प्रसंग से भारतीय ज्ञान परंपरा को सम्बद्ध करते हुए मौलिक प्रतिभा के विकास की बात कही। भारतीय शब्द गाय एवं पाश्चात्य शब्द cow के भेद को परिभाषित करते हुए भाषा संस्कृति के उत्कृष्ट उदाहरण दिये । इसी तरह *कोयल अपनी मूल भाषा में बोलती है तो स्वच्छंद आकाश में घूमती है तोता दूसरों की भाषा का अनुकरण करता है इसलिए पिंजरे में बंद रहता है’। इस प्रकार से अन्य सुंदर उदाहरणों से उन्होंने श्रोताओं को बाँधे रखा। उक्त विद्वानों के व्याख्यानों की समीक्षा करते हुए डॉ. बेठियार सिंह साहू ने भारतीय ज्ञान परंपरा के व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान आकृष्ट किया। संगोष्ठी के व्याख्यान क्रम में डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव ने भारतीय ज्ञान प्राप्त करने के दो मुख्य रास्ते बताए-पहला अनुभव सिद्धांत और दूसरा बुद्धिवादी सिद्धांत। उन्होंने तीसरा रास्ता अध्यात्म वाद सिद्धांत को भी महत्वपूर्ण बताया । अध्यात्मवाद सिद्धांत के अन्तर्गत प्राचीन वेद उपनिषद के लौकिक -पारलौकिक समन्वय को आवश्यक माना गया।
अगले क्रम में रीना झा की यह महत्त्वपूर्ण विशेषता रही कि उन्होंने संगोष्ठी की विषयवस्तु “भारतीय ज्ञान परंपरा “ को नक्षत्र विज्ञान से जोड़कर सर्वथा नया दृष्टिकोण रखा । नक्षत्र विज्ञान के इस विश्लेषण में
समय, पक्ष, ऋतुओं, का वर्णन करते हुए उन्होंने विश्लेषण कर श्रोताओं को चमत्कृत कर दिया।
डॉ. वीणा विज उदित ( अमेरिका ) ने अपने संक्षिप्त वक्तव्य में भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा मंत्रालय का एक भाग बताते हुए इसके मुख्य आयामों पर प्रकाश डाला। उन्होंने वेद, उपनिषद, महाकाव्य, को मुख्य अंग बताते हुए सारगर्भित समीक्षात्मक टिप्पणी की।
मिजोरम विश्वविद्यालय के वरिष्ठ हिन्दी आचार्य सुशील कुमार शर्मा ने भारतीय ज्ञान परंपरा विषयक अपने वक्तव्य में शिक्षा प्रणाली द्वारा भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने की बात करते हुए पूर्वोत्तर भारत के आठ राज्यों का विश्लेषण नमस्ते शब्द द्वारा किया तथा अनेक उदाहरणों से उनकी विशेषताओं का उल्लेख किया।उनके व्याख्यान से पूर्वोत्तर भारत की जीवन शैली का वर्तमान स्वरूप स्पष्ट हुआ । इसी तरह सोफिया विश्वविद्यालय बुल्गारिया से प्रो. जय कौशल पूर्वोत्तर की असम जनजाति के विषय में अपने विचार रखे एवं भारतीय ज्ञान परंपरा में ग्राम्य जीवन में प्रचलित छोटी-छोटी दवाइयाँ ,आयुर्वेदिक उपचार आदि का महत्त्वपूर्ण स्थान होना निर्दिष्ट किया ।अगली कड़ी मे
डॉ . मृदुल कीर्ति ( प्रवासी साहित्यकार) अमेरिका ने अत्यंत आध्यात्मिक और दार्शनिक चिंतन के साथ प्रवृत्ति से निवृत्ति की ओर जाने की यात्रा को भारतीय ज्ञान परंपरा का मूल सूत्र एवं आधार मानते हुए एक ही मंत्र में सब कुछ समाया हुआ बताया - ईशोपनिषद् का पहला और सबसे प्रसिद्ध मंत्र है-“ईशावास्यम् इदं सर्वम्'।
तत्पश्चात सोनल श्रीवास हिन्दी शोधार्थी ने इस विशिष्ट शीर्षक पर केन्द्रित आयोजन को वर्तमान युग जीवन के लिए अत्यंत प्रासंगिक बताते हुए विद्वानों के विश्लेषण को शोध की दृष्टि से ज्ञानवर्धक निरूपित किया। इससे शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्र से जुड़ा हुआ भारतीय समाज लाभान्वित होगा। नार्वे के वरिष्ठ प्रवासी साहित्यकार और द्वितीय सत्र के कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल ने स्वप्रेरित हो कर इस संगोष्ठी को वैश्विक संदर्भ में वर्तमान भारतीय जीवन के लिए प्रेरक बताया ।
रविशंकर विश्वविद्यालय रायपुर में हिन्दी की शोधार्थी जानकी साव ने समग्रत: प्रथम सत्र के व्याख्यानों की समीक्षा करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा के नवीन दृष्टिकोण को रेखांकित किया तथा विद्वानों के अभिमत को वर्तमान परिवेश में प्रासंगिक और प्रेरक बताया । इस सत्र को समाहार रूप में डॉ. सीमा रानी प्रधान ने वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य में उपादेय बताते हुए अपना संदेश प्रेषित किया ।
ऑफलाइन और ऑनलाइन संयुक्त पद्धति से द्वितीय सत्र का अन्तर्राष्ट्रीय काव्य पाठ डॉ. मीनकेतन प्रधान के संचालन में अपेक्षाकृत विलंब से प्रारंभ हो सका। विश्व हिन्दी अधिष्ठान के विदेश संयोजक नीदरलैंड के प्रवासी साहित्यकार मनीष पांडे ने काव्य पाठ के सहभागी रचनाकारों का संक्षिप्त स्वागत वक्तव्य प्रस्तुत किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए नार्वे के प्रवासी साहित्यकार डॉ. सुरेश चन्द्र शुक्ल ने अपनी इस पंक्ति से काव्य पाठ की शुरुआत की -‘मानव होना भाग्य है, कवि होना सौभाग्य है।’ भारत के राष्ट्रपति से पुरस्कृत
कैनेडा की प्रवासी साहित्यकार डॉ. स्नेह ठाकुर ने सर्वप्रथम अपनी उत्कृष्ट कविता ‘हम भारतवासी, हम भारतवासी’ का पाठ कर भारत भूमि के प्रति अपने लगाव और राष्ट्रीय भावना का परिचय दिया।इनके बाद अगली कड़ी में नीदरलैंड की प्रवासी साहित्यकार अश्विनी केवगांवकर ने वीरता पूर्ण भावनाओं से ओतप्रोत रचना ‘दंडवत माता अहिल्या मैं धन्य धन्य हो जाऊँ जब अपने छोटे मुख से साक्षात आपके गुण गाउँ ’ का लोमहर्षक पाठ किया । कैनेडा की बहुचर्चित प्रवासी हस्ताक्षर डॉ. शैलजा सक्सेना
ने हमेशा की तरह प्रभावशाली ढंग से अपने ‘काव्य- नाटक ‘ के कुछ अंशों का पाठ किया - ‘आज फिर गोधूलि बेला का प्रहर’ ।इसी तारतम्य में तालचेर ओडिशा के प्रतिष्ठित साहित्यकार दिनेश कुमार माली ने ओड़िया के प्रसिद्ध कवि सीताकांत महापात्र की कविता ‘ उड़ीसा ‘ की प्रभावी प्रस्तुति की । तत्पश्चात अमेरिकी की प्रतिष्ठित प्रवासी साहित्यकार डॉ कादंबरी आदेश ने हिन्दी के प्रख्यात कवि हरिशंकर आदेश की एक कविता संवाद मौन हो जाते हैं का पाठ करने के बाद अपनी कविता ‘भारत मेरी धड़कन में रहता है’ की सस्वर प्रस्तुति से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। इसी कड़ी में काव्य पाठ के लिए डॉ.ज्ञानेश्वरी सिंह को आमंत्रित किया गाया, किन्तु उन्होंने काव्य पाठ नहीं किया जिससे अगले क्रम में लोकप्रिय कवि अंजनी कुमार तिवारी सुधाकर ने काव्य पाठ किया । इस अवसर पर लखनऊ से प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. करुणा पांडे ने ‘सुना है सत्य की सदा विजय होती है’ कविता का पाठ किया । सोफिया विश्वविद्यालय बुल्गारिया में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे जितेंद्र सिंह ने हिन्दी के प्रति अपने झुकाव का परिचय देते हुए ‘आजादी ‘ कविता का पाठ किया। अंतिम चरण में प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार डॉ. मौना कौशिक ने ‘गंगा’ शीर्षक से
तथा कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ, सुरेश चंद्र शुक्ल ने देशभक्ति से ओतप्रोत कविता का पाठ किया । मंच संचालक डॉ. मीनकेतन प्रधान ने अपनी आशु कविता का पाठ किया । अंत में विश्व हिन्दी अधिष्ठान की न्यासी डॉ. विद्या प्रधान ने सभी रचनाकारों के प्रति आभार प्रकट करते हुए अधिष्ठान की गतिविधियों को आगे बढ़ाने की अपील की । समूचे आयोजन को उत्कृष्ट और अकादमिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण बताते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय में पदस्थ डॉ.सौरभ सराफ ने धन्यवाद ज्ञापित किया । इस तरह यह आयोजन अपने उद्देश्य के अनुरूप वैश्विक स्तर पर सार्थक और उत्कृष्ट रहा ।
सोनल मावतवाल श्रीवास शोधार्थी, रायगढ़(छत्तीसगढ़)










