"माँ" जीती जागती प्रार्थना हैं

मातृ दिवस - (मदर्स डे)

एक वक्त के बाद फूल सूख जाते हैं। किताबों के पन्ने पीले पड़ जाते हैं। ठहरे हुए पानी में काई जम जाती है। ठीक वैसी ही अवस्था हो जाती है मां के मन की।कभी उसकी आत्मा के पन्ने पलटकर देखिएगा। वहाँ मिलेंगी कुछ आड़ी-टेढ़ी लकीरें। उनका अनुवाद दुनिया की किसी शब्दकोश में नहीं मिलेगा। क्योंकि वो लकीरें स्याही से नहीं, त्याग से खिंची गई हैं। धीमे कदम, कांपते हाथ, भूले हुए फोन नंबर, एक ही बात का बार-बार दोहराना... हम इसे बुढ़ापा कहते हैं। पर सच तो ये है कि ये कमजोरी नहीं है। ये एक लंबी, जतन से जी गई जिंदगी की कीमत है। ये वो बिल है जो उसने हम सबको पालने के लिए चुकाया है। गर्म कड़ाही से जले हाथों के निशान, फटी ऐड़ियां, उंगलियों पर चाकू के कट - ये महज निशान नहीं हैं। ये सबूत हैं। सबूत इस बात के कि उसने सिर्फ अपनी जिंदगी खर्च नहीं की, अपना शरीर भी खर्च कर दिया। हर जले का निशान एक कहानी है - उस सब्जी की जो बेटे को सबसे पसंद थी। हर कटी उंगली के पीछे वो जल्दबाजी है, जब स्कूल की छुट्टी का वक्त हो रहा था और लंच बाकी था। उसने घर की चारदीवारी को मकान से "घर" बनाया। और इस घर को अपने कमजोर कंधों पर ढोते-ढोते, कब उसके कंधे खुद जर्जर हो गए, उसे पता ही नहीं चला। कब वो वक्त के साथ थोड़ी चिड़चिड़ी, थोड़ी खुरदुरी हो गई, ये वो खुद नहीं समझ पाई। हमें पता ही नहीं चला कि कब दूसरों को स्वाद परोसते-परोसते उसकी खुद की जीभ इतनी थक गई कि अब कोई स्वाद जुबान पर लगता ही नहीं। सालों तक सबकी पसंद का ख्याल रखते-रखते वो भूल ही गई कि उसे खुद क्या पसंद था। उसकी थाली हमेशा सबसे आखिर में लगती थी। और आज, जब सबकी थाली लग चुकी है, तो उसकी अपनी थाली का स्वाद उड़ चुका है। जिंदगी एक मटके की तरह थी। उस मटके में उसने रिश्ते, उम्मीदें, सपने सब सहेज कर रखे। पर जिम्मेदारियों ने उस मटके में इतने सुराख कर दिए कि जिंदगी कब रिस-रिस कर खत्म हो गई, पता ही नहीं चला। हां, रह गई हैं कुछ अधूरी इच्छाएं। पर उन्हें पूरी करने की अब चाह भी नहीं बची। वक्त ने सिर्फ शरीर नहीं चुराया, चाह को भी मार दिया। अब अगर आप पूछेंगे भी - "मां, तुम्हें क्या चाहिए?" तो जवाब मिलेगा - "कुछ नहीं बेटा, तुम खुश रहो।" क्योंकि उसकी खुशी बहुत पहले ही आपकी खुशी में विलीन हो चुकी है। मां को फोन कीजिए। किसी काम से नहीं। बस इतना पूछने के लिए - "मां, आज तुम्हारा मन क्या खाने का है?" क्योंकि जिस माँ ने पूरी उम्र आपसे ये सवाल पूछा, कहीं वो ये सुनने को तरस तो नहीं गई? माँ सिर्फ एक रिश्ता नहीं है। माँ एक जीती-जागती प्रार्थना है, जो रोज थोड़ा-थोड़ा करके खत्म हो रही है, ताकि हम पूरी तरह जी सकें। वक्त रहते पहचान लीजिए। कहीं देर न हो जाए। ममतामयी माँ को कोटि - कोटि नमन। - - हिना पुजारा (सोशियल राइटर)

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