मां-बाप-सा जग में ना दूजा
जग में आने का सुन्दर अवसर पाया,
मां की कोख में पलकर जीवन पाया।
पीड़ा सहकर मां ने हमें जन्म दिया,
पिता ने संघर्ष कर हर सुख दिया।
उंगली पकड़ चलना हमको सिखलाया
गिरने पर फिर हौसला भी बढ़ाया।
घर को गुरुकुल बनाकर ज्ञान दिया
संस्कारों का अमूल्य सम्मान दिया।
पढ़-लिखकर हमने पहचान बनाई।
मां-बाप ने हर कठिनाई अपनाईं।
अपनी इच्छाओं का त्याग जो किया
संतानों के सपनों को साकार किया।
आज वही मां-बाप अकेले रह जाते।
अपने ही बच्चे उनसे दूर हो जाते।
सम्पत्ति के खातिर रिश्ते बंट जाते।
ममता के सारे बंधन सब टूट जाते।
श्रवण कुमार-से पुत्र जो बन जाते
मां-बाप की सेवा में वे सुख पाते।
बेटियां भी आज मिसाल बन रही हैं।
हर कर्तव्य को दिल से निभा रही हैं।
बुढ़ापे का सहारा बनना सीखो।
मां बाप का सम्मान करना सीखो।
सच्चा सुख इनके चरणों की पूजा,
मां-बाप-सा जग में और ना दूजा।
देवतुल्य माता-पिता को मत सताना।
इनकी सेवा को अपना धर्म बनाना।
इनके आशीर्वाद से जीवन खिलता।
हर मनोकामना की दीपक जलता।
जगदेव प्रसाद पटेल "प्राचार्य"
लोकमान्य तिलक उ.मा.वि.चक्रधर नगर रायगढ़








