अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी अधिवेशन बनारस में डॉ.मीनकेतन प्रधान आमंत्रित एवं कविताएँ प्रकाशित

रायगढ़ - - भाषा सहोदरी हिंदी (न्यास) एवं महात्मा गाँधी काशी विद्यापीठ बनारस के संयुक्त तत्वावधान में
भाषा सहोदरी हिंदी का 11वाँ अंतर्राष्ट्रीय  हिंदी अधिवेशन विगत 14-15 सितम्बर 2024 को विद्यापीठ के विशाल सभागार में संपन्न हुआ।जिसमें डॉ.मीनकेतन प्रधान सेवानिवृत्त प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष हिंदी ,किरोड़ीमल शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय,पूर्व अध्यक्ष अध्ययन मंडल हिन्दी-शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय रायगढ़ छत्तीसगढ़ को अकादमिक सहभागिता हेतु आमंत्रित कर उनकी कविताओं  का प्रकाशन ‘भाषा सहोदरी काशी संग्रह ‘में किया गया है।

पितृशोक  के कारण इस अधिवेशन  में उनके सम्मिलित नहीं हो पाने से उन्हें प्रदत्त स्मृति चिह्न और मोमेंटो आदि सामग्रियों को रायगढ़ निवासी केशव जायसवाल श्रीमती   सालमनी की सुपुत्री मोनिका जायसवाल ने बनारस अधिवेशन में उपस्थित हो कर प्राप्त किया।ज्ञात हो कि रायगढ़ में पली -बढ़ीं मोनिका जायसवाल वैवाहिक संबंधों के फलस्वरूप बनारस में रहतीं हैं ।इस कार्य में अजय जायसवाल का विशेष सहयोग रहा।अधिवेशन में सम्मिलित हो कर मोनिका ने  बताया कि भारत के अनेक राज्यों सहित  विदेश से भी विद्वानों की गरिमामयी सहभागिता थी।जिसमें  हिन्दी भाषा साहित्य के विकास एवं समृद्धि पर विशेष रूप से गहन विमर्श  हुआ ।डॉ.जय कान्त मिश्रा, मुख्य संयोजक भाषा सहोदरी हिंदी (न्यास) तथा प्रो. निरंजन सहाय काशी विद्यापीठ, बनारस के कुशल  मार्गदर्शन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संपन्न इस अधिवेशन का ऐतिहासिक महत्त्व है ।इस अधिवेशन में डॉ. मीनकेतन प्रधान को आमंत्रित किये जाने से रायगढ़ नगर सहित छत्तीसगढ़ का साहित्यिक गौरव बढ़ा है ।कला साहित्य संस्कृति धानी रायगढ़ की गौरवशाली साहित्यिक परंपरा  की यह एक अगली कड़ी है ।इसके लिए अनेक साहित्यकारों एवं बुद्धिजीवियों ने उन्हें बधाई दी है। भाषा सहोदरी हिंदी (न्यास) नयी दिल्ली द्वारा प्रकाशित ‘काशी संग्रह ‘ में डॉ. मीनकेतन प्रधान की तीन महत्वपूर्ण कविताएँ-कुररी 1,2,3, को समादृत किया गया है ।इन कविताओं में हिन्दी छायावाद के प्रणेता प्रख्यात साहित्य मनीषी पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय की बहुचर्चित कविता ‘कुररी के प्रति’(सरस्वती पत्रिका जुलाई 1920)में निहित प्रश्नों के भावात्मक प्रत्युत्तर हैं ,जिसमें सौ वर्ष बाद 2020 की वैश्विक महामारी कोरोना की भीषण त्रासदी ,मानवीय संवेदना और   कारुणिक स्थितियों को आधुनिक संदर्भों में  अभिव्यक्त  किया गया है।भाषा सहोदरी ‘काशी संग्रह’ में प्रकाशित इन छंदोबद्ध  कविताओं की कुछ पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं-
       * कोरोना से सहमी दुनिया
          मरे लोग अनजान ।
          लॉकडाउन’ में शहर सूना
          लाइन लगी श्मशान॥
      * जीते को भी युद्ध मारता    
          है गवाह इतिहास।
         झुंड को नयी राह दिखाता
         सदियों का प्रतिभास ॥
     * ज्ञान की आँखों से देखता   
       विज्ञान सभी ओर ।
       इंसान मगर नहीं देखता
       अपना चेतन छोर॥
     * पुराने -नये बराबर चले    
        बदलता रहा दौर।
        लदते इक्कीसवीं सदी में
        ‘करू कविता ‘ के बौर॥
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