नील नभ की भीगी पलकों पर

जलराग  

(स्वरचित कविता) 

--- सुजाता मिश्रा शोधार्थी हिंदी



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नील नभ की भीगी पलकों पर,

साँझ में सपनों के दीप जले,

महासागर के मौन हृदय में,

कितने युगों के स्वर हैं पले।

मैंने देखा—

लहरों ने तट से कुछ कहा था,

शायद कोई पुराना किस्सा,

जो समय स्वयं भी भूल चला था।

सरिता उतरी पर्वत-आँगन से,

चूड़ी-सी खनकी शिलाओं पर,

वन-पथ, पत्तों, सूखे मन में,

हरियाली लिखती रही निरंतर।

ताल-तलैया की स्थिर आँखों में,

आकाश उतर कर सो जाता,

एक अकेला चाँद किनारे बैठा,

जल में अपना रूप सजाता।

मूक जलों की गहरी तह में,

कितनी स्मृतियाँ बहती होंगी,

सूखी धरती की थकी हथेली पर,

कितनी आशाएँ रहती होंगी।

जल केवल बहता तत्व नहीं,

यह धरती का स्पंदन है,महासागर,

सरिता, ताल-तलैया—जीवन का मौन वंदन है।

सुजाता मिश्रा (शोधार्थी )रायगढ़ (छत्तीसगढ़ )

SK
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