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हिन्दी साहित्य के समकालीन स्वरूप, वैश्विक परिदृश्य और नई चुनौतियों पर होगा अन्तर्राष्ट्रीय मंथन

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‘इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य : विविध परिदृश्य’ विषयक द्वि-दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठी 30 एवं 31 अक्टूबर को रायगढ़ में

देश-विदेश के साहित्यकार, शिक्षाविद्, कुलपति एवं शोधार्थी होंगे शामिल; चयनित शोध-पत्रों का ISBN युक्त पुस्तक में होगा प्रकाशन

रायगढ़ – – हिन्दी भाषा और साहित्य की समृद्ध परम्परा, समकालीन सृजनात्मक प्रवृत्तियों, बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक परिदृश्यों तथा वैश्विक स्तर पर हिन्दी साहित्य के विकास की संभावनाओं पर व्यापक विचार-विमर्श के उद्देश्य से 30 एवं 31 अक्टूबर 2026 को ‘इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य : विविध परिदृश्य’ विषयक द्वि-दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया जा रहा है। संगोष्ठी का आयोजन छत्तीसगढ़ के रायगढ़ स्थित शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय में ऑफलाइन एवं ऑनलाइन, दोनों माध्यमों से किया जाएगा।

वहीं इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुए डॉ मीनकेतन प्रधान ने बताया कि कार्यक्रम प्रतिदिन प्रातः 10:30 बजे से प्रारम्भ होगा। इस अन्तरराष्ट्रीय आयोजन में देश-विदेश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, शिक्षाविदों, विश्वविद्यालयों के कुलपतियों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों तथा विद्यार्थियों की सहभागिता रहेगी।
यह संगोष्ठी केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली; विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास (पंजीकृत), रायगढ़; शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ तथा देवम फाउंडेशन, बुल्गारिया (यूरोप) के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित की जा रही है। आयोजन का प्रमुख उद्देश्य इक्कीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य की विविध प्रवृत्तियों, उपलब्धियों, अन्तर्विरोधों, चुनौतियों और भावी दिशाओं का गहन अध्ययन करते हुए साहित्यिक चिंतन को व्यापक राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य प्रदान करना है।

इक्कीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य की बदलती दिशाओं पर होगा गहन विमर्श—
इक्कीसवीं सदी के प्रारम्भिक वर्षों से ही हिन्दी साहित्य में विषयवस्तु, शिल्प, भाषा, अभिव्यक्ति और रचनात्मक दृष्टि के स्तर पर व्यापक परिवर्तन देखने को मिले हैं। वैश्वीकरण, उदारीकरण, बाजारवाद, वैज्ञानिक प्रगति, सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी, डिजिटल माध्यमों और बदलती सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों ने साहित्य की प्रकृति तथा उसके सरोकारों को नए आयाम प्रदान किए हैं। समकालीन साहित्य अब केवल व्यक्तिगत संवेदनाओं और सौन्दर्यबोध तक सीमित नहीं है, बल्कि वह सामाजिक विषमता, मानवीय संकट, राजनीतिक प्रतिरोध, पर्यावरणीय असन्तुलन, सांस्कृतिक अस्मिता, लोकतांत्रिक चेतना तथा हाशिए के समाजों के संघर्षों को भी प्रभावशाली ढंग से अभिव्यक्त कर रहा है। इन्हीं परिवर्तनों को केन्द्र में रखते हुए आयोजित इस संगोष्ठी में विचार किया जाएगा कि इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य अपने समय और समाज को किस प्रकार अभिव्यक्त कर रहा है, उसकी रचनात्मक दिशाएँ किस तरह बदल रही हैं और वैश्विक स्तर पर हिन्दी साहित्य की भूमिका एवं संभावनाएँ क्या हैं। साहित्य के बदलते स्वरूप, नए विमर्शों, भाषिक प्रयोगों, कथ्यगत विविधताओं तथा सृजन और पाठकीयता के बीच विकसित हो रहे नए संबंधों पर भी सार्थक चर्चा की जाएगी।

कविता, कहानी, उपन्यास से लेकर डिजिटल साहित्य तक अनेक विषय होंगे चर्चा के केन्द्र–
संगोष्ठी के लिए व्यापक विषय-क्षेत्र निर्धारित किया गया है, जिसके अंतर्गत हिन्दी साहित्य की विभिन्न विधाओं और प्रवृत्तियों पर शोध-पत्र आमंत्रित किए गए हैं। इनमें इक्कीसवीं सदी की हिन्दी कविता, समकालीन गीत एवं नवगीत, हिन्दी ग़ज़ल, मंचीय कविता, युवा कविता, स्त्री-स्वर, दलित एवं आदिवासी अभिव्यक्ति, प्रेम, प्रकृति और मानवीय संबंधों की समकालीन संवेदना प्रमुख हैं। इसके अतिरिक्त हिन्दी उपन्यास में बदलते सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, किसान संकट, महानगरीय संवेदना, राजनीतिक सत्ता, लोकतंत्र, स्त्री-विमर्श तथा हाशिए के समुदायों के जीवन-संघर्षों पर भी विमर्श प्रस्तावित है। समकालीन हिन्दी कहानी, लघुकथा, विज्ञान-कथा, फैंटेसी, नाटक, रंगमंच, व्यंग्य, ललित निबंध, आत्मकथा, संस्मरण, डायरी, जीवनी और यात्रा-साहित्य जैसे विषय भी संगोष्ठी के व्यापक अकादमिक दायरे में सम्मिलित हैं।

इसी क्रम में दलित साहित्य, आदिवासी साहित्य, किन्नर विमर्श, वृद्ध विमर्श, दिव्यांग विमर्श, अल्पसंख्यक समुदायों की साहित्यिक अभिव्यक्ति, प्रवासी भारतीयों का साहित्य, स्त्री-लेखन और पर्यावरण चेतना जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर भी शोध एवं आलोचनात्मक दृष्टि से विचार किया जाएगा। इन विमर्शों के माध्यम से साहित्य में सामाजिक न्याय, समानता, अस्मिता, मानवीय गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों की अभिव्यक्ति को समझने का प्रयास किया जाएगा।

संगोष्ठी में हिन्दी भाषा के वैश्विक विस्तार, प्रवासी साहित्य की विशिष्टता, भारतीय एवं विदेशी साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन, हिन्दी पत्रकारिता, साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं, अनुवाद, लोक साहित्य, लोकभाषाओं तथा भारतीय ज्ञान परम्परा और हिन्दी साहित्य के अंतर्संबंधों पर भी विचार-विमर्श होगा।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सोशल मीडिया और तकनीकी विकास के साहित्य पर प्रभाव पर भी चर्चा–
वर्तमान समय में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इंटरनेट, सोशल मीडिया, ब्लॉग, डिजिटल प्रकाशन, ऑडियो-बुक और ऑनलाइन साहित्यिक मंचों ने लेखन, प्रकाशन, प्रसार तथा पाठकीय अनुभव की प्रकृति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए हैं। इन माध्यमों ने साहित्य के सृजन और पाठकों तक उसकी पहुँच के लिए नई संभावनाएँ खोली हैं, वहीं मौलिकता, रचनात्मक स्वतंत्रता, बौद्धिक संपदा, साहित्यिक गुणवत्ता और नैतिक उत्तरदायित्व से जुड़े प्रश्न भी सामने आए हैं।

इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संगोष्ठी में ‘तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और हिन्दी साहित्य’, ‘सोशल मीडिया और हिन्दी लेखन के नए रूप’, ‘डिजिटल दौर और हिन्दी साहित्य’ तथा ‘नई साहित्यिक विधाएँ और बदलते पाठक’ जैसे विषयों पर शोध-पत्र आमंत्रित किए गए हैं। आयोजकों की अपेक्षा है कि इन विषयों पर होने वाला विमर्श साहित्य और तकनीक के बीच विकसित हो रहे संबंधों को समझने में उपयोगी सिद्ध होगा।
शोध-पत्रों के निर्माण में मौलिकता, अकादमिक ईमानदारी और नैतिक मानकों के पालन पर भी विशेष बल दिया गया है। आयोजन की सूचना में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग के दौरान COPE द्वारा निर्धारित दिशानिर्देशों तथा नैतिक मूल्यों का पालन करने की अपेक्षा व्यक्त की गई है।

देश-विदेश के प्रतिष्ठित साहित्यकारों एवं शिक्षाविदों की सहभागिता–
इस अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी में भारत के विभिन्न राज्यों के साथ-साथ विदेशों में हिन्दी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय विद्वानों को आमंत्रित किया गया है। आमंत्रित अतिथियों एवं वक्ताओं की सूची में विश्वविद्यालयों के कुलपति, वरिष्ठ साहित्यकार, प्राध्यापक, आलोचक, शोधकर्ता और प्रवासी साहित्यकार शामिल हैं।
आमंत्रित विशिष्ट व्यक्तित्वों में प्रो. नंदिनी साहू, डॉ. विनय कुमार पाठक, डॉ. केशरी लाल वर्मा, प्रो. आर. डी. पाटीदार, प्रवासी साहित्यकार श्री तेजेन्द्र शर्मा (ब्रिटेन), डॉ. स्नेह ठाकुर (कनाडा), डॉ. मौना कौशिक (बुल्गारिया), श्री मनीष पांडेय ‘मनु’ (नीदरलैंड), डॉ. सुशील कुमार शर्मा, डॉ. अवधेश प्रधान, श्री अरुण कमल, प्रो. अनामिका, श्री लीलाधर मंडलोई, डॉ. करुणा पांडे, श्री दिनेश कुमार माली, डॉ. श्रीराम परिहार, डॉ. विनोद कुमार मिश्र, डॉ. अखिल मिश्र, डॉ. श्रद्धा सिंह, डॉ. राजेश्वर कुमार, प्रो. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, डॉ. गौरी त्रिपाठी, डॉ. ज्ञानेश्वरी सिंह, डॉ. बेठियार सिंह साहू, डॉ. सौरभ सराफ सहित अनेक विद्वान सम्मिलित हैं।
देश के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े इन साहित्यकारों और शिक्षाविदों की सहभागिता से हिन्दी साहित्य की विविध क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय प्रवृत्तियों को एक साझा मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा। आयोजकों का विश्वास है कि इस संवाद से समकालीन साहित्यिक चिंतन को नई दृष्टि प्राप्त होगी तथा हिन्दी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन और अनुसंधान को प्रोत्साहन मिलेगा।

शोधार्थियों और युवा अध्येताओं के लिए महत्त्वपूर्ण अवसर–यह संगोष्ठी विशेष रूप से उन शोधार्थियों, विद्यार्थियों, युवा लेखकों और अध्येताओं के लिए महत्त्वपूर्ण है, जो इक्कीसवीं सदी के हिन्दी साहित्य की नई प्रवृत्तियों पर शोध कर रहे हैं। इसमें प्रतिभागियों को अपने शोध-निष्कर्षों को प्रस्तुत करने, विभिन्न साहित्यिक दृष्टियों से परिचित होने और देश-विदेश के विद्वानों के साथ अकादमिक संवाद स्थापित करने का अवसर मिलेगा।

आयोजन के लिए मौलिक एवं अप्रकाशित शोध-पत्र और आलेख आमंत्रित किए गए हैं।इनमे से चयनित शोध-पत्रों का ISBN युक्त पुस्तक में प्रकाशन विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास द्वारा किया जाएगा। प्रकाशित पुस्तक प्रतिभागियों एवं साहित्य के अध्येताओं के लिए उपयोगी संदर्भ सामग्री के रूप में उपलब्ध कराने की योजना है।
डॉ. मीनकेतन प्रधान के संयोजन में हो रहा है आयोजन

इस अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी के संरक्षक एवं संयोजक डॉ. मीनकेतन प्रधान हैं, जो विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास, रायगढ़ के संस्थापक-अध्यक्ष हैं। वे हिन्दी भाषा और साहित्य के अध्ययन, अनुसंधान, सृजन तथा राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय साहित्यिक संवाद को प्रोत्साहित करने के लिए सक्रिय हैं।

संगोष्ठी के सह-संयोजकों में डॉ. रवींद्र कौर चौबे, अनुसंधान एवं विकास प्रकोष्ठ, शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़; डॉ. बेठियार सिंह साहू, सहायक प्राध्यापक,हिन्दी, राजेंद्र महाविद्यालय, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (बिहार); तथा डॉ. सौरभ सराफ, सहायक प्राध्यापक, हिन्दी, दिल्ली विश्वविद्यालय शामिल हैं। विदेश संयोजन का दायित्व डॉ. मौना कौशिक, इंडोलॉजी विभाग, सोफिया विश्वविद्यालय, बुल्गारिया एवं देवम फाउंडेशन की अध्यक्ष, तथा प्रवासी साहित्यकार श्री मनीष पांडेय ‘मनु’ को सौंपा गया है।
आयोजक संस्था विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास का उद्देश्य हिन्दी भाषा और साहित्य के समग्र उन्नयन के लिए राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना, हिन्दी सहित क्षेत्रीय भाषाओं एवं लोकसाहित्य पर शोध को बढ़ावा देना, तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन को विकसित करना तथा साहित्यिक पुस्तकों के प्रकाशन और संगोष्ठियों के माध्यम से विद्वानों एवं साहित्यकारों को साझा मंच उपलब्ध कराना है।

हिन्दी साहित्य के वैश्विक संवाद को मिलेगी नई दिशा
आज हिन्दी साहित्य एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जिसमें परम्परा और आधुनिकता, स्थानीयता और वैश्विकता, मुद्रित साहित्य और डिजिटल माध्यम तथा स्थापित साहित्यिक मान्यताओं और नए विमर्शों के बीच निरंतर संवाद विकसित हो रहा है। ऐसे समय में इस प्रकार की अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठियाँ साहित्य के बदलते स्वरूप को समझने, विभिन्न दृष्टियों के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने और भविष्य की रचनात्मक दिशाओं की पहचान करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

‘इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य : विविध परिदृश्य’ विषयक यह संगोष्ठी न केवल समकालीन हिन्दी साहित्य की उपलब्धियों और चुनौतियों पर विचार करने का अवसर प्रदान करेगी, बल्कि साहित्य, समाज, संस्कृति, तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संबंधों को समझने की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण पहल होगी।
आयोजकों ने देश-विदेश के साहित्यकारों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और हिन्दी प्रेमियों से इस अन्तर्राष्ट्रीय आयोजन में सहभागिता करने तथा हिन्दी साहित्य के समकालीन विकास पर होने वाले वैचारिक विमर्श को सफल बनाने की अपील की है।

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जनचर्चा सीजी डॉट इन
संपादक
हरिशंकर गौरहा "हरि"
केलो विहार कॉलोनी, रायगढ़ छत्तीसगढ़
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