कविताएँ-अरुण कुमार साहू

कवि परिचय -अरुण कुमार साहू राजदूत, भारतीय राजदूतावास,अल्फ्रेड नोबेल 4, सोफिया, बुल्गारिया। जन्म – पलुनीपाड़ा , कंसार ,जिला देवगढ़ (ओडिशा)।1996 में भारतीय विदेश सेवा (IFS) शिक्षा- किंग्स कॉलेज, लंदन से स्नातकोत्तर तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली से भाषा विज्ञान में स्नातकोत्तर ।लेखन -ओडिया और अंग्रेजी में कविता ,निबंध, उपन्यास अंग्रेजी कृतियों में “त्रिनिदाद और टोबैगो: ए डिप्लोमैट्स कल्चरल एक्सपीडिशन” ,
कविता संग्रह “इगुआना एंड अदर पोएम्स” प्रमुख हैं ।अनुवादक – डॉ.मौना कौशिक,इंडोलॉजी विभाग,सोफिया यूनिवर्सिटी,बुल्गारिया —-कविताएँ —
(1)कैसा लगता है
भक्ति, पर अनुयाई नहीं;
मार्ग वृहद, पर कोई यात्री नहीं;
अनगिनत ढोल, पर कोई वादक नहीं;
सेवा, पर कोई सेवक नहीं;
मठ है , पर कोई सभा नहीं;
श्रद्धा, पर कोई उपासक नहीं;
प्रसाद भरपूर आपका,
पर आनंद बाजार में कोई लेना -देना नहीं;
दिव्य सौंदर्य में प्रकाशमान तुम , पर कोई श्रद्धालु/भक्त
नहीं,
हे प्रभु जगन्नाथ!
कैसा लगता है? कैसी है अनुभूति यह
सुनसान है सिंहद्वार,
अछूता है अरुण स्तंभ,
व्यथित हैं तुम्हारे प्रवेश के पावन द्वाविंशति सोपान,
फटा हुआ है मंदिर का ध्वज,
कभी गांठ में बंधा, कभी आग में जलता,
तुम हो अपने ही राज्य में बंदी ,
कैसा लगता है?
न रथ, न कोई सारथी; न साथी,
न कोई मित्र; न राजा, न घोड़ा, न हाथी;
न शंखध्वनि, न घंटा, न घड़ियाल;
न कोई पुकारने वाला,
न हांकने वाला, न ढोने वाला,
ना रथयात्रा की कोई तैयारी ;
हे प्रभु! कैसा लगता है?
(2) अचानक
अचानक
मैंने सुना“तुम चले गए”,
रात की तनी हुई मद्धिम साँस में,
बढ़ते दर्द के बीच,
कोई भविष्यवाणी नहीं, कोई चेतावनी नहीं,
ना कोई सूचना, कोई तैयारी नहीं
संक्रमित कोरोनावायरस से अचानक।
दूर ट्रेन की सीटी धीरे-धीरे पीछे खिसकती गई,
चमकीला चाँद हो गया ऊँघता सा
संकुचित आसमान का स्पर्श महसूस हुआ
और
पतझड़ की सिहरन आ गई
नहीं जानता क्यों हथेलियाँ गीली थीं,
अचानक।
इन वर्षों में तुम्हारा साया रहा,
केवल एक छाप बन कर
आवाज़ तुम्हारी छोड़ चुकी ताल -गीत तुम्हारा धुन,
तब से – जब तुमने समुद्र को पार किया —एक छलांग/
कुलांच में,
अचानक।
तुम्हारी,उस तट की ओर की बड़ी है दुनिया,
बड़ी हैं सीपियाँ, बड़े घोंघे और कछुए ,
लहरें, तट और किनारा, रेत, चट्टानें और रेत से बने
महल,और उत्सव -धूम-धड़ाका
अप्रत्याशित थी तुम्हारी खबर, और,
अप्रत्याशित थी तुम्हारी यादों की वापसी
ना तुरही, ना घंटी, ना कोई टँकार और तुम चले गए
पर मुझे उम्मीद थी
किसी दिन जब हम फिर मिलेंगे आमने-सामने
चाहे यमुना के तट पर या हडसन के किनारे,
एक गर्म चाय की प्याली पर ,मैं केवल एक ही सवाल
पूछूँगा जो मैंने कभी न पूछा था —
“क्या तुम्हारे सारे काम ऐसे ही होते हैं?”
अचानक।——
(“ इगुआना एण्ड अदर पोयंस ” अंग्रेज़ी काव्य संग्रह से )

————प्रस्तुति- डॉ.मीनकेतन प्रधान,पूर्व प्रोफेसर हिन्दी,किरोड़ीमल शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय,रायगढ़ (छ.ग. )मो. नं. 9424183086



