वैश्विक कीर्तिमान -मीनकेतन प्रधान, दस पुस्तकों का लोकार्पण
रायगढ़ – – केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, नई दिल्ली); विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास (पंजी.), रायगढ़; शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) एवं देवम फाउंडेशन, बुल्गारिया (यूरोप) के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित दो दिवसीय अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी ‘इक्कीसवीं सदी का हिन्दी साहित्य : विविध परिदृश्य’ दिनांक 30 एवं 31 अक्टूबर 2026 को शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के मुख्य सभागार में हाइब्रिड माध्यम (ऑफलाइन एवं ऑनलाइन) से पूर्ण गरिमा, भव्यता एवं अकादमिक गुणवत्ता के साथ संपन्न हुई।
• संगोष्ठी की मूल संकल्पना एवं उद्देश्य
• इक्कीसवीं सदी के आरंभिक छब्बीस वर्ष बीतने के ऐतिहासिक पड़ाव पर हिन्दी साहित्य ने विषय, विधा, भाषा और माध्यम—सभी स्तरों पर नूतन रूप धारण किए हैं। वैश्वीकरण, वैज्ञानिक-तकनीकी विकास, सूचना क्रांति और सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना के व्यापक प्रभाव से हिन्दी साहित्य की अन्तर्वस्तु एवं शिल्प की दिशाएँ निरंतर बदल रही हैं। साथ ही नए विमर्शों और भावाभिव्यक्ति के कई नए आयाम उभर कर सामने आ रहे हैं। इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का मूल उद्देश्य साहित्य में परिलक्षित इन्हीं युगांतरकारी बदलावों, अन्तर्विरोधों और दिशान्तरण पर देश-विदेश के शीर्ष विद्वानों, प्राध्यापकों, शोधार्थियों और युवा अध्येताओं की सहभागिता के माध्यम से गंभीर, निष्पक्ष और अकादमिक चिंतन-मनन संपन्न करना था।

• आयोजन की पृष्ठभूमि एवं प्रशासनिक समन्वय
• कार्यक्रम की संपूर्ण कार्ययोजना, अकादमिक सत्रों के स्वरूप, तकनीकी प्रबंधन एवं देश-विदेश से पधार रहे विद्वानों के आतिथ्य सत्कार को सुनिश्चित करने हेतु शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति प्रोफेसर विनय चौहान तथा विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास के संयोजक डॉ. मीनकेतन प्रधान के मध्य विश्वविद्यालय के प्रशासनिक कक्ष में उच्चस्तरीय समन्वय बैठक संपन्न हुई, जिसमें आयोजन को भव्य एवं सुव्यवस्थित बनाने हेतु बिंदुवार निर्णय लिए गए।
• सहभागिता एवं प्रस्तुति
• ऑनलाइन माध्यम से कुल पंजीयन: 297 प्रतिभागी
• ऑफलाइन माध्यम से कुल पंजीयन: 165 प्रतिभागी
• कुल पंजीकृत प्रतिभागी संख्या: 462 प्रतिभागी
• सहभागी देशों की कुल संख्या: 07 देश
• सहभागी भारतीय राज्यों की संख्या: 13 राज्य
• ऑनलाइन माध्यम से शोध-पत्र प्रस्तुतिकरण: 70 शोध-पत्र
• ऑफलाइन माध्यम से शोध-पत्र प्रस्तुतिकरण: 20 शोध-पत्र
• कुल शोध-पत्र प्रस्तुतिकरण: 90 शोध-पत्र
• आमंत्रित विद्वान वक्ताओं के आधिकारिक व्याख्यान/वक्तव्य: 25 वक्तव्य
• आयोजित तकनीकी/अकादमिक सत्रों की कुल संख्या: 07 (सत्र)
• मंच से लोकार्पित ग्रंथ-
वैश्विक हिन्दी कविता- (एक) वैश्विक स्तर का संचयन , 85 प्रवासी साहित्यकार समाहित । करु विग्रह ( काव्य संचयन)- 51 हिन्दी एवं अन्य भाषाओं से अनूदित राष्ट्रीय स्तर की कविताएँ । नंदिनी साहू का रचना संसार-(अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद) – अनुवाद दिनेश कुमार माली, नए भाव -शिल्प के कवि मीनकेतन प्रधान* (समीक्षा पुस्तक ) लेखक श्री दिनेश कुमार माली। मीनकेतन प्रधान की समकालीन काव्य -चेतना( समीक्षा पुस्तक)- समीक्षक श्री अंजनी कुमार तिवारी सुधाकर । ‘काजल भीगी ऑंखों का’( काव्य – संग्रह) नीदरलैंड के प्रवासी कवि मनीष पांडेय ‘मनु’।
‘छायावाद के सौ वर्ष और मुकुटधर पांडेय ‘-प्रति समीक्षा ग्रंथ ( संचयन – मीनकेतन प्रधान)। हाइकु शतदल ( संचयन )- प्रदीप कुमार दाश। इस अवसर पर चिरंजीव राव की काव्य कृति- ‘जलियाँवाला बाग’ कथा वेदमणि सिंह ठाकुर की कृति की प्रतियां प्रवासी साहित्यकारों एवं अतिथियों को की गई ।
• उद्घाटन सत्र (दिनांक: 30 अक्टूबर 2026)
• अध्यक्षीय उद्बोधन: शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर विनय चौहान ने अपने अध्यक्षीय भाषण में देश-विदेश के सुधी साहित्यकारों व चिंतकों के समागम को विश्वविद्यालय व अंचल के लिए ऐतिहासिक गौरव बताया तथा संयोजक डॉ. मीनकेतन प्रधान की संगठनात्मक निष्ठा को आयोजन की रीढ़ निरूपित किया।
• मुख्य अतिथि वक्तव्य: ओ. पी. जिंदल विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. आर. डी. पाटीदार ने आज के तकनीकी व आपाधापी भरे दौर में मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों के संरक्षण हेतु साहित्य की चेतना से जुड़ने को अनिवार्य रेखांकित किया।
• विशिष्ट वक्तव्य एवं बीज व्याख्यान:
◦ डॉ. दीपक पांडेय (सहायक निदेशक, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, नई दिल्ली): निदेशालय द्वारा भाषा-साहित्य संवर्धन हेतु संचालित वित्तीय अनुदान, अध्ययन-भ्रमण व संस्थागत योजनाओं की विस्तृत जानकारी दी।
◦ डॉ. मौना कौशिक (सोफिया विश्वविद्यालय, बुल्गारिया / अध्यक्ष, देवम फाउंडेशन): विशिष्ट वक्ता के रूप में आधिकारिक बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए वैश्विक परिप्रेक्ष्य में हिन्दी साहित्य की उपस्थिति और यूरोपीय देशों में इसके अध्ययन-अध्यापन पर प्रकाश डाला।
◦ डॉ. स्नेह ठाकुर (कनाडा): राष्ट्रपति पुरस्कार से अलंकृत प्रवासी साहित्यकार ने हिन्दी के वैश्विक प्रसार पर सारगर्भित वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए अपनी कविताओं का पाठ किया।
◦ अरुण कमल: साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कवि ने अपनी कालजयी कविता ‘धार’ का प्रभावशाली पाठ किया।
◦ श्री तेजेंद्र शर्मा (ब्रिटेन) एवं श्री मनीष पांडेय ‘मनु’ (नीदरलैंड): प्रवासी जीवन के सरोकारों और रचनात्मक नवाचारों पर सारगर्भित विचार रखे।
• ग्रंथ लोकार्पण: उद्घाटन मंच से समकालीन साहित्य, विमर्श एवं लोक-संस्कृति पर आधारित 10 शोधपरक ग्रंथों का एक साथ औपचारिक लोकार्पण संपन्न हुआ।
• सत्र संचालन: डॉ. सौरभ सराफ, सहायक प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा किया गया।

• प्रथम दिवस के अकादमिक सत्रों का सार
• पूर्वोत्तर संस्कृति व साहित्य: प्रो. सुशील कुमार शर्मा (मिज़ोरम केंद्रीय विश्वविद्यालय) ने पूर्वोत्तर की जनजातीय जीवनशैली, विधि-सम्मत आचरण, सादगी और साहित्यिक अवदान पर तथ्यपरक व्याख्यान दिया।
• काव्य विधा की प्रासंगिकता: प्रो. सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी (जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा) ने कविता की कालजयी प्रकृति और स्थायी मानवीय मूल्य को रेखांकित किया।
• समकालीन उपन्यास: प्रो. गौरी त्रिपाठी (गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिलासपुर) ने समकालीन उपन्यासों के सामाजिक यथार्थ और सरोकारों का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया।
• आलोचना का संकट: डॉ. पुनीत कुमार राय (शासकीय महाविद्यालय, शंकरगढ़) ने समकालीन आलोचनात्मक विमर्श, पुरस्कार-संस्कृति तथा अकादमिक वातावरण की चुनौतियों पर गंभीर चिंतन रखा।
• सत्र समीक्षा: पूर्व आचार्य डॉ. राजेश दुबे द्वारा प्रथम एवं द्वितीय सत्र के सभी व्याख्यानों की सारगर्भित समीक्षा प्रस्तुत की गई।
• द्वितीय दिवस के अकादमिक सत्र (दिनांक: 31 अक्टूबर 2026)
द्वितीय दिवस के छठे एवं सातवें तकनीकी सत्रों की अध्यक्षता साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कवि अरुण कमल ने की। उन्होंने छायावाद के प्रणेता पद्मश्री मुकुटधर पाण्डेय के अवदान को नमन करते हुए सभी तकनीकी सत्रों के विमर्श के स्तर और शोध-दृष्टि की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
कथा-पाठ:
ब्रिटेन के वरिष्ठ कथाकार श्री तेजेंद्र शर्मा ने प्रवासी जीवन की जटिलताओं, सांस्कृतिक द्वंद्व और मानवीय रिश्तों की भीतरी परतों को उद्घाटित करने वाली अपनी बहुचर्चित कहानी ‘गोद उतराई’ का प्रभावशाली पाठ किया।
सत्रवार विषय विशेषज्ञों के वक्तव्य:
• छठा तकनीकी सत्र (समकालीन विमर्श):
◦ डॉ. मौना कौशिक (सोफिया विश्वविद्यालय, बुल्गारिया): प्रवासी महिला साहित्यकारों के अवदान पर विस्तार से विचार रखते हुए स्पष्ट किया कि सुदूर देशों में सृजनरत भारतीय मूल की महिला रचनाकारों ने केवल विस्थापन और नॉस्टैल्जिया की पीड़ा ही नहीं लिखी, बल्कि वैश्विक धरातल पर भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों, दोहरी संस्कृति के संघर्ष और स्त्री-अस्मिता को एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई।
◦ डॉ. सौरभ सराफ (दिल्ली विश्वविद्यालय): ‘भारत विभाजन और इक्कीसवीं सदी के हिन्दी उपन्यास’ विषय पर व्याख्यान देते हुए रेखांकित किया कि विभाजन केवल 1947 का एक ऐतिहासिक या राजनीतिक घटनाक्रम मात्र नहीं है, बल्कि इक्कीसवीं सदी के उपन्यासकार इसे विस्थापन, स्मृति, सांस्कृतिक जड़ों के विनाश और पीढ़ी-दर-पीढ़ी रिसने वाले अनसुलझे मानवीय संत्रास के रूप में गहराई से पुनर्परिभाषित कर रहे हैं। समकालीन कथा-साहित्य विभाजन के घावों को केवल सीमाओं के संदर्भ में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना, सांप्रदायिक सौहार्द की पुनर्बहाली और विस्थापितों के अस्तित्व संघर्ष के रूप में दर्ज कर रहा है। यह विमर्श वर्तमान समय में भी विस्थापन की वैश्विक मानवीय त्रासदी को समझने का अत्यंत सशक्त और संवेदनशील माध्यम है।
◦ डॉ. सुषमा देवी: स्त्री-विमर्श के बदलते आयामों पर बोलते हुए कहा कि समकालीन स्त्री-लेखन केवल आक्रोश तक सीमित न रहकर स्वावलंबन और निर्णय-क्षमता को स्वर दे रहा है।
◦ डॉ. सीमा रानी प्रधान: कथेतर गद्य विधाओं पर विचार रखते हुए कहा कि संस्मरण और आत्मकथा जैसी विधाएँ यथार्थपरक होने के कारण पाठकों से सीधा संवाद साध रही हैं।
◦ डॉ. चन्द्रिका चौधरी: समकालीन कथा-साहित्य के अंतर्गत कहानी-पाठ प्रस्तुत कर मानवीय संवेदनाओं को उजागर किया।
• सातवाँ तकनीकी सत्र (विविध विधाएँ एवं माध्यम):
◦ डॉ. हेमचंद्र पाण्डेय: जीवनी साहित्य के महत्व को स्पष्ट करते हुए ऐतिहासिक व्यक्तित्वों के प्रामाणिक दस्तावेजीकरण पर बल दिया।
◦ प्रो. प्रमोद झा: हिन्दी पत्रकारिता के समकालीन परिदृश्य पर बोलते हुए निष्पक्षता और भाषाई शुचिता की वर्तमान चुनौतियों को चिन्हित किया।
◦ श्री अंजनी तिवारी ‘सुधाकर’: व्यंग्य एवं डायरी लेखन पर विचार रखते हुए दैनिक अनुभूतियों और विसंगतियों पर तीखे प्रहार को साहित्य की ताकत बताया।
◦ श्री अंकुर शुक्ला: मीडिया के प्रभाव पर व्याख्यान देते हुए न्यू-मीडिया द्वारा साहित्य के प्रसार और उसके प्रभाव-क्षेत्र का विश्लेषण किया।
◦ डॉ. रमेश चंद्र श्रीवास्तव: विकलांग विमर्श पर बोलते हुए दिव्यांग वर्ग की साहित्यिक अभिव्यक्ति और समाज में उनकी गरिमा व अधिकारों को रेखांकित किया।
◦ डॉ. गजेन्द्र तिवारी: विज्ञान एवं तकनीकी के प्रभाव पर विचार रखते हुए तकनीक के साहित्य में प्रवेश और वैज्ञानिक चेतना के विस्तार की बात कही।
◦ डॉ. रामायण प्रसाद टंडन: दलित एवं आदिवासी विमर्श पर बोलते हुए हाशिए के समाजों के जल-जंगल-जमीन के संघर्ष और अस्मिता की रक्षा को साहित्य का प्राथमिक सरोकार बताया।
◦ सत्र धन्यवाद ज्ञापन: डॉ. बी. के. भगत द्वारा किया गया।
• ऑनलाइन शोध-पत्र वाचन सत्र: संगोष्ठी के समानांतर ऑनलाइन तकनीकी सत्र में देश-विदेश के 70 शोधार्थियों द्वारा शोध-पत्रों का प्रभावी वाचन संपन्न हुआ। इस संपूर्ण ऑनलाइन सत्र का कुशल संचालन डॉ. बेठियार सिंह साहू, सहायक प्राध्यापक, जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (बिहार) द्वारा किया गया।
• समापन सत्र एवं निष्कर्ष
• मुख्य अतिथि: प्रो. विनय चौहान, माननीय कुलपति, शहीद नंदकुमार पटेल विश्वविद्यालय, रायगढ़ ने इस अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी को विश्वविद्यालय की अकादमिक यात्रा में ‘मील का पत्थर’ निरूपित किया तथा भविष्य में भी ऐसे आयोजनों को जारी रखने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।
• सम्मान समारोह: आमंत्रित विद्वानों, प्रवासी अतिथियों एवं वक्ताओं को विश्वविद्यालय एवं विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास की ओर से शॉल, श्रीफल व स्मृति चिह्न प्रदान कर सम्मानित किया गया।
• आभार प्रदर्शन: मुख्य संयोजक डॉ. मीनकेतन प्रधान ने केंद्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा मंत्रालय), विश्वविद्यालय प्रशासन, देवम फाउंडेशन (बुल्गारिया) तथा समस्त सहयोगियों के प्रति विधिवत आभार व्यक्त किया।
• सत्र संचालन: संपूर्ण संगोष्ठी के मुख्य अकादमिक सत्रों का सुव्यवस्थित एवं कुशल संचालन डॉ. सौरभ सराफ, सहायक प्राध्यापक, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा किया गया।
• आगामी कार्ययोजना
संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध-पत्रों में से विशेषज्ञ समिति द्वारा चयनित उत्कृष्ट एवं मौलिक शोध-आलेखों को अंतरराष्ट्रीय मानक पुस्तक संख्या (ISBN युक्त संदर्भ ग्रंथ) के रूप में विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास द्वारा शीघ्र प्रकाशित किया जाएगा।
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डॉ. मीनकेतन प्रधान)
संयोजक – अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी
संस्थापक-अध्यक्ष, विश्व हिन्दी अधिष्ठान न्यास (पंजी.)
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)
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