कला - साहित्य
भाई दूज

छंद-कृपाण घनाक्षरी
आते यहाँ ख़रीदार, कपड़ों की भरमार,
सजा हुआ है बाज़ार
,मिले हमें उपहार।
पर्व यह बड़ा प्यारा, बहना को लगे न्यारा,
,‘सुषमा’ है जग सारा,सुखी रहे परिवार।
शुभ्र दिन प्रिय पर्व, बहना करें हैं गर्व,
चाहती हैं स्नेह सर्व,
माँगती हैं बार-बार।
पहन के साड़ी लाल, आरती सजा के थाल,
अरुण तिलक भाल,भाई दूज का त्यौहार।——————————————
—✍️सुषमा प्रेमपटेल – रायपुर छ ग


