
श्रावण शुक्ला सप्तमी, राजापुर था गाँव।
जहाँ जन्म तुलसी लिए, पूत पालने पाँव।।
हुलसी माँ भी जन्म दे, छोड़ चली परलोक।
भिक्षा से दिन बीतते, मात बिना अति शोक।।
त्याग पिता ने पुत्र जब, चुनिया धाय महान।
मंदिर में नरहरि मिले, मिली शरण गुरु ज्ञान।।
भार्या कटु उपदेश से, लिए जगत संन्यास।
हृदय हुआ व्याकुल बहुत, चलते बने प्रवास।।
रामचरित मानस रचे, कवियों के सरताज।
जन-जन में उल्लास है, शुभ-शुभ होता काज।।
राम-राम जपते सदा, लिख चौपाई छंद।
दोहा रोला सोरठा, सरस छंद का बंद।।
मानस पावन ग्रंथ से, होता जग कल्याण।
राम नाम की सत्यता, साक्षी वेद पुराण।।
मर्यादा की बात जब, करता संत समाज।
त्याग,तपस्या,धर्म की, उपमा देते आज।।
बैठ घाट चंदन घिसे, माथ सजे रघुवीर।
तुलसी जीवन धन्य हो, कटे पाप सह पीर।।
सीता के प्रिय राम जी, ‘सुषमा’ करती ध्यान।
लिखकर मानस पंक्तियाँ, तुलसी बने महान।।
…कवयित्री सुषमा प्रेम पटेल ,रायपुर , छ. ग








