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01 फरवरी पुण्यतिथि पर विशेष रोशन लाल अग्रवाल :

रोशन लाल अग्रवाल : संघर्ष, सादगी और सामाजिक सरोकार का जीवित नाम— गणेश कछवाहा

समय निरंतर गतिमान है। परिस्थितियाँ बदलती रहती हैं, पर कुछ मानक ऐसे होते हैं जो हर युग में शाश्वत रहते हैं। वे आदर्श बनते हैं, समाज के सर्वोच्च मूल्यों का प्रतीक बनते हैं और लोगों के हृदय में स्थायी स्थान बना लेते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्व थे रोशन लाल अग्रवाल — जिनका नाम आज भी संघर्ष, सादगी और सामाजिक सरोकार के पर्याय के रूप में लिया जाता है। स्मृतियों में बसता नायक-1 फरवरी 2021 को वे जीवन और मृत्यु के संघर्ष के बीच अचानक हमसे विदा हो गए। परंतु कुछ लोग इतिहास में दर्ज नहीं होते, वे इतिहास रचते हैं और स्मृतियों में जीवित रहते हैं। रोशन अग्रवाल उन्हीं में से एक थे।रायगढ़ या छत्तीसगढ़ में यदि किसी से पूछा जाए — “लघु हनुमान चालीसा बांटने वाले विधायक कौन थे?” — तो सहज उत्तर मिलता है, रोशन लाल अग्रवाल। यह उनकी पहचान बन चुकी थी।सफेद पायजामा-कुर्ता, साधारण स्कूटर और सीधा-सादा व्यक्तित्व — वे पद से नहीं, व्यवहार और कार्यशैली से पहचाने जाते थे।भीषण गर्मी, ठंड या बरसात — वे गली-मोहल्लों, दुकानों, घरों और झोपड़ियों तक पहुँचते। जाति, धर्म, वर्ग या भाषा का कोई भेदभाव नहीं। उनकी भाषा में हरियाणवी ठेठपन और हिंदी की आत्मीयता का अनोखा मेल था। बदलते राजनीतिक दौर में अडिग मूल्य-रोशन भाई हमेशा मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं को बहुत महत्व देते थे।समय के साथ राजनीतिक मूल्य और प्राथमिकताएँ बदलीं, पर सामाजिक आदर्श और मानवीय संवेदनाएँ आज भी उतनी ही आवश्यक हैं। रोशन अग्रवाल विकास को केवल भौतिक प्रगति के रूप में नहीं देखते थे। उनके लिए समाज का वंचित वर्ग विकास के केंद्र में था।हाउसिंग बोर्ड के डायरेक्टर के रूप में रहते हुए भी वे सिद्धांतों से समझौता नहीं करते थे। मंत्री पद, प्रतिष्ठा या दबाव — इनमें से किसी का भय उन्हें सच बोलने से रोक नहीं सका।

मानवीय विकास बनाम दिखावटी विकास-आज विकास के बड़े दावे किए जाते हैं, भारी बजट खर्च होते हैं, फिर भी आमजन में असंतोष दिखाई देता है। इसका कारण यही है कि विकास यदि मानवीय सरोकारों से कट जाए, तो वह अधूरा रह जाता है।

रायगढ़ की सबसे बड़ी समस्या है –  ख़तरनाक  प्रदूषण का  डेंजर जोन में होना। रायगढ़ में प्राथमिक काम होना चाहिए कैसे रायगढ़ को ख़तरनाक  प्रदूषण के डेंजर जोन से बाहर निकाला जाय । पर्यावरण के संरक्षण तथा संपूर्ण जीवजगत की प्राणों की रक्षा कैसे हो , इस पर पूरा ध्यान केंद्रित होना चाहिए ।ऐसा न कर नए उद्योगों की स्थापना एव पुराने उद्योगों के विस्तार की झड़ी सी लगा दी गई।मतलब प्रदूषण से मुक्ति की जगह ,प्रदूषण का खतरा और गहराना । प्रश्न  उठता है कि लोगों के जान प्राण खतरे में डालकर हम किसका और क्या विकास कर रहे हैं ?मानवीय मूल्य विहीन विकास को विकास कैसे कहा जा सकता है ? रोशन लाल अग्रवाल के लिए पर्यावरण संरक्षण, जलस्रोतों की सुरक्षा और स्वच्छता  केवल मुद्दे नहीं, जीवन-मूल्य थे। राजनीति नहीं, सामाजिक प्रतिबद्धता- उनके लिए राजनीति सत्ता का माध्यम नहीं, समाज सेवा का दायित्व थी। वे सभी विचारधाराओं के लोगों से संवाद रखते थे।स्व. नंदकुमार पटेल और रोशन लाल अग्रवाल — दोनों ऐसे जननेता थे जिनमें पद का अहंकार नहीं, बल्कि संवाद की विनम्रता थी। रोशन भाई ज़मीनी स्तर पर काम करने में विश्वास रखते थे। अपनी युवा टीम के साथ वे स्वयं सफाई व्यवस्था, जलभराव और स्थानीय समस्याओं का निरीक्षण करते। प्रशासनिक अधिकारियों को मौके पर बुलाकर समाधान सुनिश्चित कराते। यह सक्रियता और काम का जुनून ही उनकी असली पहचान थी।

सर्वांगीण विकास की सोच–रोशन भाई सामाजिक संघर्षों से राजनीति में आए।सभी के साथ मिलना जुलना,संवाद करना,विचार विमर्श करना उनकी दिनचर्या का एक भाग था।इसलिए उनके पास एक स्पष्ट समझ विकसित हो चुकी थी कि केवल औद्योगिक या भौतिक विकास ही विकास नहीं है बल्कि मानवीय और सामाजिक मूल्यों पर आधारित विकास सही मायने में विकास है। इस प्रकार सर्वांगीण विकास की परिकल्पना सजोये हुए थे। एक बार विचार विमर्श के दौरान मुझे फाइल दिखा रहे थे , संस्कृति,कला,संगीत, साहित्य ,स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों , सामाजिककार्ताओं ,बुद्धिजीवियों एव महापुरुषों की अलग अलग सूची उनकी पूरी जानकारी उनके लिए स्थायी कार्ययोजना ताकि आने वाली पीढ़ी भी अपने इतिहास,पुरातत्व,धरोहर और विरासत को अच्छी तरह से जाने समझे और प्रेरणा ले।उनके कार्यकाल के दौरान ही बहुत सी गलियों,मार्ग कॉलोनी का नामकरण किया गया।उन्हें यह बात अच्छी तरह समझ में आ गई थी उद्योग,पूँजी भौतिक संसाधनों के विकास के साथ साथ संस्कृति कला सभ्यता के विकास के बिना हम एक सुसंस्कृत,सभ्य और विकसित  समाज के निर्माण  की कल्पना साकार नहीं कर सकते हैं।जमीन से उठे, मूल्यों से जुड़े–उन्होंने गरीबी और संघर्ष को देखा ही नहीं, जिया था। दरी बिछाने से लेकर संगठन खड़ा करने तक का सफर तय किया।

कोई राजनीतिक वंश परंपरा नहीं थी — मेहनत, संगठन और प्रतिबद्धता ही उनकी पूँजी थी।अटल बिहारी वाजपेयी उनके आदर्श थे और सर्वदलीय सद्भाव उनका मूल मंत्र। स्पष्टवादिता की कीमत–सीधी और सच्ची बात कहना उनका स्वभाव था। सामाजिक जीवन में यह गुण माना जाता है, पर राजनीति में कई बार यही कठिनाई बन जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना रहा कि “वे चुनाव से नहीं, राजनीति की प्रवृत्तियों से हारे।” नकारात्मकता और वैमनस्य की राजनीति उनके स्वभाव से मेल नहीं खाती थी।

वे स्मृति नहीं, समाज की चेतना हैं–स्मरण में बहुत सी बातें है जो विस्मृत नहीं होती।ठहरा पानी सड़ जाता है — इसलिए उन्होंने युवाओं की नई धारा तैयार की। आज जब समाज में संवाद कम और कटुता अधिक दिखती है, तब उनकी याद और भी प्रासंगिक हो उठती है।वे जोड़ते थे, तोड़ते नहीं। सुनते थे, थोपते नहीं। संघर्ष करते थे, पर मूल्यों से समझौता नहीं करते थे।रोशन भाई आज भौतिक रूप से हमारे बीच नहीं हैं, पर उनका संघर्ष, उनकी जिजीविषा और उनके सपने आज भी समाज में जीवित हैं। ऐसे लोग कभी नहीं मरते — वे समाज की चेतना बन जाते हैं।

गणेश कछवाहालेखक, चिंतक एवं समीक्षक रायगढ़, छत्तीसगढ़gp.kachhwaha@gmail.comप्रवास – पुणे महाराष्ट्र।

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