कला - साहित्य
“लिखूँ कुछ ऐसा”

“लिखूँ कुछ ऐसा”
नए वर्ष की नई सुबह, नई कलम, नई डायरी,
लिखूँ कुछ ऐसा कि मोह लूँ दुनिया सारी।
टूटे सपनों के टुकड़े जोड़ूँ,
शांत अधरों के शब्द बुनूँ,
लिखूँ कुछ ऐसा
कि भटके अपनों की राह चुनूँ।
दीन-दुखी जन की पीड़ा
हर दिल तक पहुँचा पाऊँ,
लिखूँ कुछ ऐसा
कि सबके मन को छू जाऊँ।
निर्बल का मान बचा पाऊँ,
निर्धन की जान बचा पाऊँ,
लिखूँ कुछ ऐसा
कि हर मन में उजाला फैलाऊँ।
हृदय के जंग लगे दरवाज़ों
के ताले तोड़ सकूँ,
लिखूँ कुछ ऐसा
कि सबके चित्त को जोड़ सकूँ।
झूठ को प्रकट करूँ
और सच का अनुष्ठान करूँ,
लिखूँ कुछ ऐसा
कि सबके हृदय में वास करूँ।
प्रकाश की सविता बन जाऊँ,
आस की सरिता बन आऊँ,
बूँद बनूँ स्वाति नक्षत्र की—
लिखूँ कुछ ऐसा कि
स्वयं ही गरिमा बन जाऊँ।
*रचनाकार* – स्वाति पण्ड्या


