कला - साहित्य

विश्व हिन्दी अधिष्ठान की काव्य गोष्ठी संम्पन्न

रायगढ़ – –  मीनकेतन प्रधान पूर्व प्राध्यापक हिन्दी किरोड़ीमल शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय रायगढ़ एवं संस्थापक विश्व हिन्दी अधिष्ठान के तत्वावधान में राष्ट्रीय स्तर की काव्य -गोष्ठी का ऑफलाइन-ऑनलाइन आयोजन कवियों की उत्साहपूर्ण सहभागिता से विगत 28 जनवरी को सम्पन्न हुई। संस्थापक मीनकेतन प्रधान ने आरंभ में अधिष्ठान के उद्देश्यों एवं कार्य योजनाओं पर प्रकाश डाला । न्यासी डॉ. श्रीमती विद्या प्रधान ने आरंभ में सभी आमंत्रित कवियों का स्वागत वक्तव्य एवं कवियों का परिचय दिया।

डॉ.ज्ञानेश्वरी सिंह के तकनीकी एवं अकादमिक संयोजन में राष्ट्रीय स्तर की इस काव्य गोष्ठी में सर्वप्रथम आंध्रप्रदेश से आये वरिष्ठ साहित्यकार लिंगम चिरंजीव राव को अंग वस्त्र एवं श्रीफल भेंटकर पंकज रथ शर्मा ने सम्मान किया। काव्य गोष्ठी में सम्मिलित कवि लिंगम चिरंजीव राव(आंध्रप्रदेश),पंकज रथ शर्मा,श्रीमती आशा मेहर किरण,सोनल मावतवाल श्रीवास ,श्रीमती डॉ. सुधा देवांगन सुचि,श्रीमती स्वाति पंड्‌या (उदयपुर राजस्थान ), अरविंद सोनी सार्थक (मालवा, म०प्र०),श्रीमती रश्मि वर्मा ,डॉ . ज्ञानेश्वरी सिंह (महाराष्ट्र)ने ऑफलाइन-ऑनलाइन काव्य पाठ किया ।जिसमें सामाजिक -आर्थिक विषमताओं से लेकर नारी सशक्तिकरण,पर्यावरण तथा अन्य समसामयिक विषयों पर सार्थक एवं प्रेरक कविताओं का पाठ किया गया ।काव्य गोष्ठी के पूर्व काव्य वाटिका रायगढ़ की ओर से मीनकेतन प्रधान तथा लिंगम चिरंजीव राव का सम्मान काव्य वाटिका की संस्थापक डॉ.आशा मेहर किरण ,डॉ.सुधा देवांगन सुचि  , संस्थापक सदस्य मनोज श्रीवास्तव  डॉ.अरविंद सोनी सार्थक,स्वाति पंड्या,मनोज श्रीवास्तव,श्रीमती रश्मि वर्मा ने शाल -श्रीफल और गमले में हरित पौधा भेंट कर किया ।इस अवसर पर अधिष्ठान के सदस्य पंकज रथ शर्मा, सोनल मावतवाल श्रीवास की विशेष उपस्थिति रही ।

काव्य गोष्ठी में पठित कविताएँ समसामयिक और युगबोध से जुड़ी हुई हुई रहीं ।गोष्ठी के आरंभ में आंध्रप्रदेश से आये कवि लिंगम चिरंजीव राव ने अपनी कविता ‘बताओ में सामाजिक परिवेश की विषमताओं के साथ नारी स्वातंत्र्य को भी व्यक्त किया -“बताओ तुम चुप क्यों हो…??/संधर्षो का अट्टहास /एहसासों का विश्वास /अपनों के बीच फिर अपनों /का परिहास।”उनकी अन्य कविता ‘अलग थी चाल ‘  की पंक्तियाँ हैं-“कुछ अलग थी चाल /उस परिन्दे की /घर के घोसले लगते उसे अच्छे न थे, /जहाँ…. औरों का मिलता /अब कहाँ है ? इस कड़ी में काव्य वाटिका संस्था की संस्थापिका डॉ.आशा मेहर ‘किरण’ ने अभाव और गरीबी से जूझ रहे जन जीवन का यथार्थ चित्रण करते हुए अपनी कविता का पाठ किया -“ठिठुरती ठंड में मासूमियत की रजाई ओढ़े/ चंद पैसों के लिए हाथ फैलाता है/ मानों इक्कीसवीं सदी को ठेंगा दिखाता है।” वहीं रश्मि वर्मा ने सांस्कृतिक ज्ञान परम्पराओं को अपनी कविताओं में उजागर किया -“विद्या एक सागर है,रत्नों से भरपूर /जितना गहरा डूबता,पाता वो भरपूर।”अगले क्रम में अरविंद सोनी ‘सार्थक’ने अपने मधुर कंठ से मंत्रमुग्ध कर दिया —“जीवन में घोलते है खुशियों के रंग सारे/कोई रहे न बेरंग/ बेघर या बेसहारे/बन करके हम सहारा /सार्थक करे जीवन को/दर्द दुखियों के बाँटें यही फर्ज हों हमारे।”गोष्ठी में उपस्थित काव्य वाटिका संस्था की कवयित्री डॉ.सुधा देवांगन ‘शुचि ने प्रकृति के सौन्दर्य और राष्ट्रीय भावना को अपनी ‘वसंत ‘ के माध्यम से सस्वर पाठ किया -“ऋतुराज है देखो लेकर आया नया बासंती रंग/खुल कर  खिल कर  झूम रहे हैं /लोग  तिरंगे संग/संदेशा लाया है रूत हर्षाया है।“ आयोजन में ऑनलाइन जुड़ी डॉ.ज्ञानेश्वरी सिंह(पुणे,महाराष्ट्र) ने अपने मोहक गीतों की प्रस्तुति की —“पुष्प पल्लवित सजीली धरा को नमन/और सितारे भरे इस गगन को नमन/आप आये तो धन्य हो गया अंजुमन/आने वाले हर एक मेहमान को नमन।“ पंकज रथ शर्मा ने अपनी आधुनिक दौर की कविता पढ़ी -“नया दौर /मौन हैं लोग  यहाँ /भीतर सबके शोर /होते कई किरदार /अभिनय का नया दौर ,/रिश्तों की रस्साकशी /नाजुक है डोर /आईने में अजीब भंगिमा /असल में कुछ और /मानता नहीं मन /सब कुछ  पाने दौड़ता /यहाँ-वहाँ हर ठौर ।”गोष्ठी की अंतिम कड़ी में मीनकेतन प्रधान ने अपनी कविता “आदमियत “   का पाठ किया – “ सांझ ढलते /अंधेरे से /जूझती रोशनी/ बेसब्री से /इंतज़ार करती /खुशनुमा सुबह का ।”अंत में डॉ.श्रीमती विद्या प्रधान ने धन्यवाद ज्ञापित किया ।

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