कला - साहित्य
“धूमिल दीप”

कविता
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धूमिल दीप”
मैं अनभिज्ञ नहीं
उस सत्य से,
जो मन के कोने में प्रज्वलित है,
और उसकी मद्धिम आँच
अंधेरों में राह दिखाती है।
मैं जानती हूँ
उस दीप के धूमिल आवरण को,
जो पलकों को कुछ क्षण के लिए ढक लेता है।
धूम का छा जाना,
अंधापन नहीं।
कभी-कभी
धूम के बिना भी
रोशनी की लालसा होती है।
सूरज की तरह
नैसर्गिक चमक
दूर क्षितिज में ढलते सूरज की परछाइयाँ
मन की आँखों में खेलती हैं।
कभी-कभी मेरी निगाहें
नीले आकाश में उगे पेड़ की छाँव खोजती हैं
जिसे प्राची हर रोज़ सींचती है,
छाँट देती है पीत पर्ण,
पतझड़ी हवा की तरह
जैसे झरते हैं हिम पर्वतों पर।
और ख्वाबों की हरसिंगार
जैसे हर पंक्ति में महक उठती है,
धीरे-धीरे,मन के कोने तक,
अंतहीन प्रकाश फैलाती हुई।

पुष्पांजलि दासे 🖋️रायगढ़ छत्तीसगढ़


