पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय जीऔर उनकी देशभक्तिपूर्ण रचनाएँ

4 जनवरी जयंती पर विशेष
रायगढ़ – – पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय द्विवेदी युग के रचनाकार थे।उनका जन्म ग्राम बालपुर (छत्तीसगढ़) में 4 जनवरी सन 1887 में हुआ ।उनका कर्म क्षेत्र रायगढ़ रहा ।अपनी कलम के दम पर भारत के उन सभी दिग्गजों के समक्ष उन्होंने अपना लोहा मनवाया जो खड़ी बोली हिंदी में लिख रहे थे और हिंदी भाषा में उच्च साहित्य सृजन हो रहा था । उस समय की उच्च स्तरीय पत्र ,पत्रिकाओं में उनकी रचनाओं का प्रकाशन हो रहा था । उनकी सादगी,जीवन के प्रति सकारात्मक सोच, विलक्षण शक्ति, सहज व्यवहार ने उन्हें ऐसे व्यक्तित्व का बना दिया कि आज भी उनके साहित्य संसार और उनके व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर दृष्टि डालने पर उनकी रचनाधर्मिता पर आश्चर्यचकित होना पड़ जाता है और वे महामानव के रूप में सामने दिखते हैं ,साथ ही पुरातत्व के क्षेत्र में भी उनके कार्यों की सराहना आज वर्तमान में भी होती है । लगभग 40 से अधिक पुस्तकों के लेखक ,कवि पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय न केवल अपने ग्रामवासियों, परिवार , रायगढ़वासियों , के लिए गौरवशाली रहे अपितु राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने ख्याति प्राप्त की। उनकी गणना अपने समकालीन साहित्य समाज के नवरत्नों में हुआ करती थी। उन्हें जो व्यापक ख्याति मिली थी, वह वास्तव में उनके हकदार थे ।
उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज के प्रबुद्धजनों के संग ही अपने पाठक वर्ग का भी दिल जीत लिया। पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय का हिंदी साहित्य द्विवेदी युगीन प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करता है। पाण्डेय जी आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के परम अनुयायी थे और द्विवेदी जी को अपना पद प्रदर्शक स्वीकारते रहे ।यही कारण है कि उनका साहित्य द्विवेदी युगीन तमाम विशेषताओं के साथ लोकहित की साधना में समर्थ हुआ है। पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय की साहित्य चेतना का जागरण उस युग में हुआ जिस युग में राष्ट्र कठिन स्थितियों से गुजर रहा था। भारत में संकट के बादल छाए हुए थे। पराधीनता की जंजीरें भारत देश की कमर ही तोड़ दी थी। विदेशी सरकार के अधीनता तले हमारा देश था। ऐसे में साहित्यकार अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों को देश प्रेम के प्रति प्रेरित कर रहे थे। जिससे कि विषम परिस्थितियों में राष्ट्र सांस्कृतिक चेतना को बनाए रख सके। ऐसे समय में सशक्त रचनाकार साहित्यकार पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय जी भी लोगों तक अपने मन की बात पहुँचाना चाहते थे और यह काम उन्होंनेअपने साहित्य के द्वारा किया।
पाण्डेय जी देशभक्त रचनाकार थे। “जीवन ज्योति” में ऐसी कविताएँ हैं जिसमें जन्मभूमि के प्रति उनके पूज्य भाव समाहित है। उनके काव्य कृति “जीवन ज्योति “की रचनाएँ जय स्वदेशी, भारतवर्ष हमारा, देश हमारा, प्यारा भारतवर्ष, जय हिंदुस्तान तथा “पद्य पुष्पांजलि “की अनेक रचनाओं में भारतवर्ष के स्वर्णिम अतीत का उल्लेख हुआ है। इस युग के सभी कवि, लेखक , साहित्यकार देश की दशा के प्रति सचेत और जागरूक थे। कवियों ने भारत के अतीत कालीन वैभव और वर्तमान दुरावस्था की तुलना कर स्थिति का स्पष्टीकरण किया। कविगण भारतीयों में उच्च कोटि की राष्ट्रीयता व नैतिकता देखना चाहते थे। यही भाव उनकी रचनाओं में भी स्पष्ट दिखाई पड़ती है ।पाण्डेय जी लिखते हैं-
“जय स्वदेश जय जय स्वदेश रुचिर वेश सुखमय विशेष
तू पूज्य परम प्रिय है महान
भू अन्य नहीं तेरे समान
तुझमें है बहुगुण सन्निवेश।
है गर्व हमें तेरा अशेष “
पाण्डेय जी ने कविता “कुसुम माला” युग की मांग के
अनुरूप लिखी है । पाण्डेयजी जीवन के समग्रता के कवि हैं। उस समय परतंत्रता का युग था ,सभी के मन में असंतोष था। ऐसे में एक कवि की भूमिका अहम हो जाती है क्योंकि उनकी रचनाएँ पढ़कर सभी जन के मन में क्रांतिकारी भावना का प्रादुर्भाव होता है ।ऐसे ही कवि थे ‘लोचन प्रसाद पाण्डेय’। वे अपने भावों को कुछ इन शब्दों में लिखकर अभिव्यक्त करते हैं-
“तू बल विद्या का है निधान
गाते हम तेरे कीर्ति गान
फैले प्रताप तब देश देश
कांटे हम तेरे सकल क्लेश।”
देश का पुरातन वैभव अर्थात तत्कालीन दयनीय स्थिति की तस्वीर राष्ट्रीयता की भावना जगाने में सहायक होती है। द्विवेदी युग के अधिकांश कवियों ने अतीत की अपेक्षा वर्तमान पर अधिक बल दिया
पाण्डेय जी लिखते हैं-
“यदि कोई पीड़ित होता है
उसे देख सब घर रोता है
देश दशा पर प्यारे भाई
आई कितनी बार रुलाई ।”
भारत देश विश्व में अपनी महत्वपूर्ण छबि एवं स्थान रखता है।देश के प्रति उनका अटूट प्रेम देखने को मिलता है ।पाण्डेय जी सच्चे अर्थों में एक देशभक्त और देश के प्रति सम्मान रखने वाले कवि थे। पाण्डेय जी ‘जय हिंदुस्तान’ कविता में राष्ट्र के प्रति अपने प्रेम का चित्रण इसी रूप में किया है। भारत देश विभिन्न संस्कृति एवं संस्कारों में रचा बसा है। अपनी इस कविता में पाण्डेय जी भारत माता का यशोगान करते हुए कहते हैं कि-
“यहाँ गंगा, जमुना, सरस्वती जैसी महानदियाँ
अपनी पावन धारा बिखेरती हैं,
गंगा,यमुना, नर्मदा, महानदी की धार
देती है जीवन
जहाँ बहती मलय बयार।”
स्वदेश पर उच्च विचारों को प्राथमिकता देने वाले पाण्डेय जी लिखते हैं-
“जय स्वदेश जय स्वदेश
जय स्वदेश प्यारा
जीवन धन्य
तू अमूल्य प्राण हमारा।”
कवि मातृभक्ति के लिए सब कुछ न्योछावर करने को तत्पर हैं । पाण्डेय जी का कविमन बाहुबल की सुदृढ़ शक्ति में विश्वास करता है।
पाण्डेय जी के “पद्य पुष्पांजलि” और “जीवन ज्योति” ऐसी रचनाएँ हैं जिसमें देशभक्ति की भावना से प्रेरित कविताओं का संग्रह है जो प्रेरक है और देश के प्रति उनके अनुराग को दर्शाती है ।
“पद्य पुष्पांजलि” के प्रकाशक नारायण प्रसाद अरोरा ने लिखा है “इस संग्रह के पदों को पढ़कर अथवा सुनकर मेरे प्यारे भाई भारतीय युवक के हृदय में यदि थोड़ी सी भी देशभक्त उत्पन्न होगी तो मैं अपने परिश्रम को सफल समझूंगा।”
पाण्डेय जी ने भी अपनी रचनाओं के माध्यम से आम जनता के मन में देशभक्ति जगाने का कार्य किया ।
पाण्डेय जी ने अपने सुंदर अतीत को लक्ष्य करके कविता लिखी है-
“हम कौन थे अब क्या हुआ
यह सोचकर अपने हिये
हमको हमारे दुर्गुणों पर
रोष लाना चाहिए
कर्तव्य अपना सोचकर
स्थिर लक्ष्य करना चाहिए
फिर हृदय में शक्ति
साहस,शौर्य भरना चाहिए।”
इसी प्रकार सरस्वती पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर उनकी एक कविता छपी थी-
“हमारा प्यारा भारत वर्ष
आदि सभ्यता सब पुण्य का
पद्य विश्व आदर्श
रामराज सुख सेतु सागर कृति केतु प्रजा का हर्ष”
देशभक्ति से संबंधित कविताओं में पाण्डेय जी क्रांति के सशक्त स्वर को लेकर चलते हैं।
भारत में अतीत और वर्तमान के गौरव प्रतीकों पर स्तुति लिखने की परंपरा प्रमुख रही है।
पाण्डेय जी ने “जीवन ज्योति” में लिखा है –
“पुण्य महाभारत से मुखरित जहाँ ग्राम वन हैं
रामायण के विजय गान में जहाँ जन हैं।”
सर्वप्रथम 1910 ईस्वी में पंडित लोचन प्रसाद पाण्डेय जी की दो चतुर्दश पंक्तियाँ ‘बाल्यकाल’ और ‘श्मशान’ प्रकाशित हुई।”कविता कुसुम माला’
नामक संकलन में है ।
किंतु पाण्डेय जी ने 1910 से पूर्व ही ‘आनंद कादम्बनी’ नामक पत्रिका में 1907 में ‘घर’ नामक कविता सॉनेट छंद में लिखी थी। अतः हिंदी साहित्य में सॉनेट लिखने की परंपरा लोचन प्रसाद पाण्डेय जी ने प्रारंभ की ।
1907 आनंद कादम्बनी में छपी उनके सॉनेट कविता ‘घर’ की कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत हैं –
जगत जननी भ्रात भगनी जहाँ।
पुण्य भूमि उसके समान जग में कहाँ।।
सुखदायिनी वह भूमि शांति की मूल है।
रोग विनाशिनी उसकी पवन धूल है
अमृत तुल्य निज शांति कुटीर है चाहे नर सुर पुर में करता वास है
तो भी ग्रह सुख की उसको अभिलाष है ।
पाण्डेय जी ने अपनी लेखनी विविध क्षेत्रों, विधाओं में चलाई है ।उनके द्वारा लिखी गई रचनाएँ, कविताएँ,लेख,नाटक कोई भी भाषा में हो पर उनका बहुत महत्व है।इसके साथ ही वे पुरातत्ववेत्ता के रूप में भी विख्यात हैं। पाण्डेय जी बहुभाषी थे ।उन्होंने छत्तीसगढ़ी, हिंदी,अंग्रेजी,उड़िया,संस्कृत में साहित्य सृजन किया ।
कहा जाता है एक साहित्यकार युग निर्माता होता है और अपने साहित्य के माध्यम से सदा जीवित रहता है और उसका साहित्य सदा पथ प्रदर्शन का कार्य करता है ।ऐसे ही मूर्धन्य विद्वान रहे पंडित लोचनप्रसाद पाण्डेय,जिन्होंने छत्तीसगढ़ की माटी को अपने साहित्य से सदा गौरवान्वित करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त की ।
आज उनकी जयंती पर सादर स्मरण के साथ उन्हें कोटि कोटि नमन।

डॉ.मनीषा अवस्थी
अध्यक्ष,विश्व हिंदी परिषद जिला रायगढ़,(छ.ग)
शैक्षणिक प्रकोष्ठ


